छबीली छबि, लखि छबि मानी हार।
छवि साकार खरी कर जोरे, सेवत भानु दुलार॥ [1]
चँवर ढुरावे सुकुमारी ढिंग, सकल कला साकार।
प्यारी सेवा में रह तत्पर, दिव्य प्रभा तनु धार॥ [2]
अगनित रति आरती उतारें, करि करि जय जयकार।
इक टक् लखत 'कृपालु' लाल जू, निज सुधि देह बिसार॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (2)
छवि की खान श्री राधा का दर्शन कर साक्षात् छवि भी पराजित हो गई। मूर्तिमती छवि हाथ जोड़े भानुनन्दिनी की सेवा में खड़ी रहती हैं। [1]
समस्त कलायें साकार रूप धारण कर सुकुमारी राधिका के ऊपर चँवर ढुलाती रहती हैं। दिव्य प्रभा साकार रूप धारण कर प्रिया राधा की सेवा में तल्लीन रहती है। [2]
असंख्यों रति जय जय का शब्द उच्चारण करती हुई राधा मुख-कमल की आरती उतारती हैं। श्री ‘कृपालु जी’ के शब्दों में श्री श्यामसुन्दर अपनी देह सुधि को भूलकर निर्निमेष नयनों से राधा-सौन्दर्य-सुधा का पान करते हैं। [3]
छवि साकार खरी कर जोरे, सेवत भानु दुलार॥ [1]
चँवर ढुरावे सुकुमारी ढिंग, सकल कला साकार।
प्यारी सेवा में रह तत्पर, दिव्य प्रभा तनु धार॥ [2]
अगनित रति आरती उतारें, करि करि जय जयकार।
इक टक् लखत 'कृपालु' लाल जू, निज सुधि देह बिसार॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (2)
छवि की खान श्री राधा का दर्शन कर साक्षात् छवि भी पराजित हो गई। मूर्तिमती छवि हाथ जोड़े भानुनन्दिनी की सेवा में खड़ी रहती हैं। [1]
समस्त कलायें साकार रूप धारण कर सुकुमारी राधिका के ऊपर चँवर ढुलाती रहती हैं। दिव्य प्रभा साकार रूप धारण कर प्रिया राधा की सेवा में तल्लीन रहती है। [2]
असंख्यों रति जय जय का शब्द उच्चारण करती हुई राधा मुख-कमल की आरती उतारती हैं। श्री ‘कृपालु जी’ के शब्दों में श्री श्यामसुन्दर अपनी देह सुधि को भूलकर निर्निमेष नयनों से राधा-सौन्दर्य-सुधा का पान करते हैं। [3]

