रामताल सतयुग के सौभरि ऋषि की तपस्थली है जिन्होंने इस क्षेत्र में समाधिस्थ होकर एक हजार वर्ष तक तपस्या की। सौभरि ऋषि कण्व ऋषि के पुत्र थे।
उधर गरुड़ मछलियों एवं रमणक द्वीप के निवासी कद्रू पुत्र सर्पों को अपना भोजन बनाने लगा। शेषनाग ने सर्पों से उनका दुख सुनकर सौभरि ऋषि की शरण लेने को कहा। तब कालियनाग के साथ पीड़ित सर्प सौभरि जी के शरणागत हुए। मुनिवर ने सभी को आश्वस्त किया एवं अहिभक्षी गरुड़ को श्राप दिया कि यदि उनके सुनरख स्थित इस क्षेत्र में पैर रखा तो भस्म हो जाएगा। यह क्षेत्र यमुना के बीच में रमणक द्वीप नाम से जाना जाता है। इस प्रकार इस स्थल में अहि, मछली तथा सभी जीव जन्तु, शान्ति पूर्वक निवास करते है।
परम तपस्वी सौभरि जी एक बार यमुना जल में डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्नियों के साथ रतिसुख का आनंद ले रहा है। उसे देख सौभरि ऋषि के मन में भी विवाह करने की इच्छा जाग उठी। महर्षि सौभरि ने राजा मान्धाता की ५० पुत्रियों से विवाह किया एवं उनके गुणवान एवं रूपवान पांच सहस्र पुत्र-पुत्रियाँ हुए तथा पौत्र प्रपौत्र भी हुए। इसके बाद उन्हे संसाररूपी लीला से पुनः वैराग्य हो गया एवं उन्होंने सन्यास ग्रहण किया।
खुदाई के दौरान यहां प्राचीन रामताल मिला, जो 2500 वर्ष से भी अधिक पुराना है, जिसकी दीवारें तालाब के चारों ओर देखी जा सकती हैं। साथ ही, उत्तर भारत के इतिहास में पहली बार, रामताल की प्राचीन दीवारों के नीचे 1.5 इंच मोटी लोहे की चादर की खोज की गई थी। इस अनूठी खोज ने कई पुरातत्वविदों को इस स्थान की ओर आकर्षित किया।
वर्ष 2016-17 में प्राचीन रामताल के मध्य में एक नया सरोवर, परिसर की सामने की चारदीवारी और मुख्य द्वार का निर्माण किया गया है।
स्थान:
रामताल वृंदावन से लगभग 3 किमी दूर उत्तर पश्चिम में सुनरख में स्थित है।
उधर गरुड़ मछलियों एवं रमणक द्वीप के निवासी कद्रू पुत्र सर्पों को अपना भोजन बनाने लगा। शेषनाग ने सर्पों से उनका दुख सुनकर सौभरि ऋषि की शरण लेने को कहा। तब कालियनाग के साथ पीड़ित सर्प सौभरि जी के शरणागत हुए। मुनिवर ने सभी को आश्वस्त किया एवं अहिभक्षी गरुड़ को श्राप दिया कि यदि उनके सुनरख स्थित इस क्षेत्र में पैर रखा तो भस्म हो जाएगा। यह क्षेत्र यमुना के बीच में रमणक द्वीप नाम से जाना जाता है। इस प्रकार इस स्थल में अहि, मछली तथा सभी जीव जन्तु, शान्ति पूर्वक निवास करते है।
परम तपस्वी सौभरि जी एक बार यमुना जल में डुबकी लगाकर तपस्या कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक मत्स्यराज अपनी पत्नियों के साथ रतिसुख का आनंद ले रहा है। उसे देख सौभरि ऋषि के मन में भी विवाह करने की इच्छा जाग उठी। महर्षि सौभरि ने राजा मान्धाता की ५० पुत्रियों से विवाह किया एवं उनके गुणवान एवं रूपवान पांच सहस्र पुत्र-पुत्रियाँ हुए तथा पौत्र प्रपौत्र भी हुए। इसके बाद उन्हे संसाररूपी लीला से पुनः वैराग्य हो गया एवं उन्होंने सन्यास ग्रहण किया।
खुदाई के दौरान यहां प्राचीन रामताल मिला, जो 2500 वर्ष से भी अधिक पुराना है, जिसकी दीवारें तालाब के चारों ओर देखी जा सकती हैं। साथ ही, उत्तर भारत के इतिहास में पहली बार, रामताल की प्राचीन दीवारों के नीचे 1.5 इंच मोटी लोहे की चादर की खोज की गई थी। इस अनूठी खोज ने कई पुरातत्वविदों को इस स्थान की ओर आकर्षित किया।
वर्ष 2016-17 में प्राचीन रामताल के मध्य में एक नया सरोवर, परिसर की सामने की चारदीवारी और मुख्य द्वार का निर्माण किया गया है।
स्थान:
रामताल वृंदावन से लगभग 3 किमी दूर उत्तर पश्चिम में सुनरख में स्थित है।

