स्वप्नेऽपि किं सुमुखि ते चरणाम्बुजात राजत्पराग - पटवास - विभूषणेन।
शोभां परामतितरामहमोत्तमांगं विभ्रद्भविष्यति कदा मम सार्थ - नाम ?
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (11)
हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्थक कर पाऊँगी।
शोभां परामतितरामहमोत्तमांगं विभ्रद्भविष्यति कदा मम सार्थ - नाम ?
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (11)
हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्थक कर पाऊँगी।

