केलि वनराजजू मैं आदि है न अंत जाकौ,
सदा ही नवीन पल पल दरसत हैं। [1]
प्यारीजू के संग प्यारौ छिनहूँ न होय न्यारौ,
निरख अलीन बार बार हरसत हैं॥ [2]
रहैं दृग जोरैं मोरैं सु लगोई रहैं,
तौबी अकुलाय धाय अंग परसत हैं। [3]
"प्रेमसखी" कानन है आनन उठाय देख,
तीन लोक स्वामी टूक हेत तरसत हैं॥ [4]
- श्री प्रेमसखी जी
नित्य लीला स्थली श्री वृन्दावन में केलि लीला नित्य ही चलायमान है, जिसका न कोई आदि है न अंत, जहाँ नित्य नवीन झांकी का दर्शन होता है। [1]
श्री प्यारी जू के संग श्री प्यारे जू नित्य विहार करते हैं, एवं एक क्षण के लिए भी विलग नहीं होते, उनके दर्शन कर सखियाँ बार-बार हर्षित होती हैं। [2]
दोनों श्री श्यामाश्याम एक दूसरे को एकटक निहार रहे हैं, फिर भी आकुलता से दौड़ कर एक दूसरे का स्पर्श प्राप्त करते हैं। [3]
श्री प्रेम सखी जी कहती हैं "वृन्दावन की नित्य विहार लीला का दर्शन कर तीनों लोको के स्वामी भी लीला पान को तरसते हैं।" [4]
सदा ही नवीन पल पल दरसत हैं। [1]
प्यारीजू के संग प्यारौ छिनहूँ न होय न्यारौ,
निरख अलीन बार बार हरसत हैं॥ [2]
रहैं दृग जोरैं मोरैं सु लगोई रहैं,
तौबी अकुलाय धाय अंग परसत हैं। [3]
"प्रेमसखी" कानन है आनन उठाय देख,
तीन लोक स्वामी टूक हेत तरसत हैं॥ [4]
- श्री प्रेमसखी जी
नित्य लीला स्थली श्री वृन्दावन में केलि लीला नित्य ही चलायमान है, जिसका न कोई आदि है न अंत, जहाँ नित्य नवीन झांकी का दर्शन होता है। [1]
श्री प्यारी जू के संग श्री प्यारे जू नित्य विहार करते हैं, एवं एक क्षण के लिए भी विलग नहीं होते, उनके दर्शन कर सखियाँ बार-बार हर्षित होती हैं। [2]
दोनों श्री श्यामाश्याम एक दूसरे को एकटक निहार रहे हैं, फिर भी आकुलता से दौड़ कर एक दूसरे का स्पर्श प्राप्त करते हैं। [3]
श्री प्रेम सखी जी कहती हैं "वृन्दावन की नित्य विहार लीला का दर्शन कर तीनों लोको के स्वामी भी लीला पान को तरसते हैं।" [4]

