(राग कान्हरौ)
कहा कहों कछु कहनु न आवे।
तेरी सों वृषभान नंदिनी तव मुख सम छबि चंदु न पावे॥[1]
छिन छिन मों दुरि जात घटा महि निकसत पैसत हेरि लजावे।
त्रिभुवन महि तो सी है तूही केवल रतिपति कहा कहावे॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (82)
हे श्री राधे, मैं क्या कहूँ, मुझसे कुछ कहते नहीं बनता।हे वृषभानु नंदिनी, मैं आपकी शपथ लेकर कहता हूँ की चंद्रमा भी आपके मुख की छवि के समान सुंदरता प्राप्त नहीं कर सकता। [1]
क्षण क्षण में चन्द्रमा बादलों में छिप जाता है और क्षण क्षण बहार आ कर आपके दर्शन कर लज्जित हो कर फिर बादलों में छिप जाता है।श्री केवल राम जी कहते हैं कि हे राधे, मैं रतिपति की क्या कहूँ, तीनों लोकों में आप के समान कोई नहीं, आप जैसी केवल आप ही हैं । [2]
कहा कहों कछु कहनु न आवे।
तेरी सों वृषभान नंदिनी तव मुख सम छबि चंदु न पावे॥[1]
छिन छिन मों दुरि जात घटा महि निकसत पैसत हेरि लजावे।
त्रिभुवन महि तो सी है तूही केवल रतिपति कहा कहावे॥ [2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (82)
हे श्री राधे, मैं क्या कहूँ, मुझसे कुछ कहते नहीं बनता।हे वृषभानु नंदिनी, मैं आपकी शपथ लेकर कहता हूँ की चंद्रमा भी आपके मुख की छवि के समान सुंदरता प्राप्त नहीं कर सकता। [1]
क्षण क्षण में चन्द्रमा बादलों में छिप जाता है और क्षण क्षण बहार आ कर आपके दर्शन कर लज्जित हो कर फिर बादलों में छिप जाता है।श्री केवल राम जी कहते हैं कि हे राधे, मैं रतिपति की क्या कहूँ, तीनों लोकों में आप के समान कोई नहीं, आप जैसी केवल आप ही हैं । [2]

