(कवित्त)
गाय उठीं किंनरी नरीन ये सुरन सबै,
द्वार द्वार नगर नगारा धुनि छाई है। [1]
सुर हरखाने दरसाने बरसाने प्रेम,
सरसाने फूल बरखा लै बरसाई है॥ [2]
बन्दीजन बिरद बखानैं भांति भांति हठी,
लीन्हो अवतार राधे वेदन हूँ गाई है। [3]
धन्य ब्रजमण्डल सु धन्य कूख कीरति की,
धन्य वृषभान जू के भाग की भलाई है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (39)
आज श्री राधारानी के प्राकट्य उत्सव पर सभी देवता, देवियाँ, किन्नर आदि आनंदित होकर गायन कर रहे हैं, और नगर-नगर, द्वार-द्वार नगाड़ों की गूंज सुनाई दे रही है। [1]
गाय उठीं किंनरी नरीन ये सुरन सबै,
द्वार द्वार नगर नगारा धुनि छाई है। [1]
सुर हरखाने दरसाने बरसाने प्रेम,
सरसाने फूल बरखा लै बरसाई है॥ [2]
बन्दीजन बिरद बखानैं भांति भांति हठी,
लीन्हो अवतार राधे वेदन हूँ गाई है। [3]
धन्य ब्रजमण्डल सु धन्य कूख कीरति की,
धन्य वृषभान जू के भाग की भलाई है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (39)
आज श्री राधारानी के प्राकट्य उत्सव पर सभी देवता, देवियाँ, किन्नर आदि आनंदित होकर गायन कर रहे हैं, और नगर-नगर, द्वार-द्वार नगाड़ों की गूंज सुनाई दे रही है। [1]
बरसाने में उमड़ते प्रेम के महासागर को देखकर सभी देवता उत्साहित हैं और सरस पुष्पों के बादलों से पुष्पवर्षा कर रहे हैं। [2]
गायक तरह-तरह से राधारानी के गुणों का बखान कर रहे हैं, और उनके प्राकट्य को वेदों में भी गाया जा रहा है। [3]
यह ब्रजभूमि धन्य है, माता कीरति की कोख धन्य है, और महाराज वृषभानु का सौभाग्य धन्य है, जिनके महल में श्री राधा का प्राकट्य हुआ। [4]

