यहीँ पर श्री कृष्ण ने व्योमासुर का वध किया था। इस गुफा को मेधावी मुनि की गुफा भी कहा जाता है क्योंकि मेधावी मुनि ने यहाँ श्री कृष्ण की पूजा की थी।
श्री बलदेव प्रभु के पदचिन्ह पास में ही पहाड़ी की तलहटी में स्थित हैं। जब श्रीकृष्ण व्योमासुर का वध कर रहे थे, तब पृथ्वी काँपने लगी। बलदेव ने अपने पैर से पृथ्वी पर दबाव डाला और इस प्रकार उसे स्थिर कर दिया। उनके पदचिन्ह आज भी दर्शनीय हैं।
एक बार, कृष्ण अपनी गायों को चराने के लिए इस स्थान पर आए। जंगल हरी घास से भरा हुआ था, जहाँ गायें प्रसन्नता पूर्वक घास खाने लगीं। बिना किसी संकोच के, श्रीकृष्ण और सखाओं ने "रक्षक और लुटेरों" का खेल खेलना शुरू कर दिया। कई सखाओं ने भेड़ होने का नाटक किया जबकि अन्य ने उनके रखवाले होने का नाटक किया। कृष्ण ने न्यायाधीश की भूमिका निभाई। कुछ ने चोरों की भूमिका निभाई और भेड़ों को चुरा लिया। भेड़ के मालिकों ने चोरों के खिलाफ न्यायाधीश के पास मुकदमा दायर किया। श्रीकृष्ण ने दोनों पक्षों को अपने सामने बुलाया और मामले पर विचार करने के लिए आगे बढ़े। इस प्रकार सभी ग्वाल बाल अपने खेल में लीन थे।
कृष्ण को मारने के प्रयोजन से, कंस के गुप्तचरों में से एक व्योमासुर, सखा के वेश में समूह में प्रवेश कर गया और चोरों में से एक बन गया। उसने भेड़ की भूमिका निभाने वाले सभी सखाओं को चुरा लिया और उन्हें इस गुफा में छिपा दिया। श्रीकृष्ण ने चारों ओर देखा और सोचा, "हमारे सब सखा कहाँ चले गए?" व्योमासुर को ग्वाल भेष में एक राक्षस के रूप में पहचानकर, वह समझ गए कि यह इसीका काम था। इसलिए उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला। भेड़ के मालिक की भूमिका निभा रहे कृष्ण और सखाओं ने तब अन्य सखाओं को पहाड़ी की गुफा से मुक्त किया। इस लीला का वर्णन श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में है।
गर्गसंहितानुसार
काशी के सम्राट् भीमरथ ने एक बार पुलस्त्य ऋषि का सम्मान नहीं किया, जिससे क्रोधित पुलस्त्य ऋषि का शाप ही उसके दैत्य बनने का कारण हुआ, किन्तु मुनियों का शाप भी कल्याण का हेतु है। भीमरथ के शरणापन्न होने पर ऋषि ने कहा- "द्वापरांत में पवित्र ब्रजमंडल में यदुवंश शिरोमणि श्रीकृष्ण द्वारा तुम्हें योगि दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति होगी।" वही भीमरथ ऋषि अपराध के कारण व्योमासुर बना, किन्तु शाप रूपी कृपा ने आज व्योम को श्रीकृष्ण का साक्षात्कार कराने में विलम्ब नहीं किया। अतः महअपराध (भक्तापराध) से तो जीव को सदैव सावधान रहना चाहिए।
स्थान:
काम्यवन में इंद्रसेन पहाड़ी के बीच में फिसलनी शिला के निकट ही व्योमसुर की गुफा है।

