देखों देखों री नागरनट - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (119)

देखों देखों री नागरनट - श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (119)

(राग रामकली व राग केदारौ)
देखों देखों री नागरनट, निर्तत कालिंदी तट,
गोपीन के मध्य राजै मुकुट लटक। [1]
काछिनी किंकिनी कटी, पीताम्बर की चटक,
कुंडल किरण रवि रथकी अटक॥ [2]
तत-थेई, ता-ता थेई, शब्द सकल घट,
उरप तिरप गति, पग की पटक। [3]
रास मध्य राधे राधे, मुरली में येई रट,
‘नंददास’ गावै तहाँ निपट निकट॥ [4]

- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली, पदावली (119)

श्री नंददास कहते हैं "अरे सखी, तनिक देखो तो नागरनट को, सर पर मुकुट लटक रही है, श्री यमुना के पुलिन पर गोपियों के मध्य कैसा अनुपम नृत्य कर रहे हैं।" [1]

श्री श्यामसुंदर की काछिनी, किंकिणि की धुनी एवं कटी प्रदेश में पीताम्बर की शोभा कैसी सुन्दर हैं, उनके कर्ण में शोभायमान कुण्डल का प्रकाश पुञ्ज देख कर तो सूर्य देव की गति थम गयी है। [2]


सब सखियाँ ता-थेई, ता-ता थेई शब्द घोष कर रही हैं जिस पर श्री श्यामसुंदर नृत्य में ऐसी गति ले रहे हैं जिसका अब तक किसी ने दर्शन नहीं किया, शब्द एवं ताल पर उनके चरण कमल की पटक तो देखो। [3]

श्री नंददास कहते हैं "रास नृत्य में श्री नन्दनन्दन अपनी मुरली में श्री राधे राधे की मधुर धुन बजा रहे हैं एवं श्री नंददास वहाँ बहुत ही निकट खड़े रस गान कर रहे हैं।" [4]