नैना निरखैं रूप कों - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (267)

नैना निरखैं रूप कों - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (267)

नैना निरखैं रूप कों, जीभ लेत निज नाम।
अंगन सों श्री अंग मिलि, पायो मन बिश्राम॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (267)

मेरे नैना नित्य ही युगल-रूप का पान करें, और जीभ नित्य ही उनके निज-नाम का रटन करे। जहाँ श्री राधा-कृष्ण के अंग नित्य परस्पर मिले रहते हैं—अर्थात् युगल-रूप—वहीं मेरे मन का विश्राम है।