(राग सारंग)
डोल झूलत बिहारी बिहारिनि पुहुप वृष्टि होति।
सुर पुर पुर गंधर्व और पुर
तिनकी नारि देखति बारति लर मोति॥ [1]
घेरा करति परस्पर सब मिलि
कहूँ न देखी ऐसी जुवती जोति।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारिनि
सादा चुरी खुभी पोति॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (75)
श्री श्यामा श्याम आनंद में भर अंग से अंग मिलकर निकुंज में झूला झूल रहे हैं एवं फूलों की वर्षा हो रही है ।
सुर लोक, गंधर्व लोक एवं अन्य लोकों की नारियाँ [लक्ष्मी, पार्वती, एवं सरस्वती] इत्यादि जो रूपवती हैं, वे सब श्री राधा की छवि देख स्तंभित हैं तथा अपने गले की मोतियों की माला वार रही हैं । [1]
सब लोकों की स्त्रियाँ एक साथ घेरा देकर (एकत्र होकर) विचार रही हैं कि ऐसी दिव्य ज्योति रूपी छवि कभी किसी युवती में नहीं देखी [अर्थात श्री राधा की दिव्य ज्योति के समक्ष सब नतमस्तक हो रही हैं ] ।
श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्यामा कुंज कुंजबिहारिनी [श्री राधा] ने चूड़ियों, कानों के झुमके, एवं कंठ में मोतियों की माला से सरल परंतु अद्भुत श्रिंगार किया है । [2]

