(राग नट)
राधे तू दधिसुत क्यों न दुरावे।
सुन सुन्दर वृषभानु नंदनी काहेको मन तरसावै॥ [1]
सारंग दुःखी होत सारंग बिन तोहि दया नहीं आवे।
जलसुत दुःखी दुःखी वे मधुकर द्वयपंछी दुःखी पावै॥ [2]
सारंग रिपु की नेंक ओट कर जो सारंग सचुपावै।
सूरदास सारंग के धोखे सारंग कुलहि लजावे॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
अरी राधा, तेरा मुख कमल चंद्रमा के समान सुन्दर है, तू इसे क्यों नहीं छुपाती। सुनो, हे श्री वृषभानु नंदिनी, उसे उजागर कर, क्यों इतने जीवों को तरसाती हो।" [1]
बिना किसी शिकारी के बाण के मृग तड़प रहा है, क्या तुम्हे कोई दया नहीं है? कमल पुष्प उदास है, उसके अंदर मधुमक्खी भी उदास है, और इसी तरह खंजन और चकोर पक्षी भी तड़प रहे हैं। [2]
कृपया अपने मुख कमल का प्रकाश ढँक लो, जिससे चंद्रमा फिर से प्रसन्न हो जाए [क्योंकि वह लज्जित हो रहा है]। श्री सूरदास कहते हैं, "हे प्यारी चन्द्रमुखी राधा जू, उन सबको लज्जित क्यों कर रही हो? [3]
राधे तू दधिसुत क्यों न दुरावे।
सुन सुन्दर वृषभानु नंदनी काहेको मन तरसावै॥ [1]
सारंग दुःखी होत सारंग बिन तोहि दया नहीं आवे।
जलसुत दुःखी दुःखी वे मधुकर द्वयपंछी दुःखी पावै॥ [2]
सारंग रिपु की नेंक ओट कर जो सारंग सचुपावै।
सूरदास सारंग के धोखे सारंग कुलहि लजावे॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
अरी राधा, तेरा मुख कमल चंद्रमा के समान सुन्दर है, तू इसे क्यों नहीं छुपाती। सुनो, हे श्री वृषभानु नंदिनी, उसे उजागर कर, क्यों इतने जीवों को तरसाती हो।" [1]
बिना किसी शिकारी के बाण के मृग तड़प रहा है, क्या तुम्हे कोई दया नहीं है? कमल पुष्प उदास है, उसके अंदर मधुमक्खी भी उदास है, और इसी तरह खंजन और चकोर पक्षी भी तड़प रहे हैं। [2]
कृपया अपने मुख कमल का प्रकाश ढँक लो, जिससे चंद्रमा फिर से प्रसन्न हो जाए [क्योंकि वह लज्जित हो रहा है]। श्री सूरदास कहते हैं, "हे प्यारी चन्द्रमुखी राधा जू, उन सबको लज्जित क्यों कर रही हो? [3]

