(दोहा)
प्रीति रीति रस बस भये, जदपि मनोहर मैन ।
तदपि रटैं निज मुष सदा, श्रीराधे राधे बैन॥
(पद) [ताल-चम्पक, राग - केदारौ]
मोहन राधे राधे बैन बोलें ।
प्रीति रीति रस बस नागरि हरि लियौ प्रेम के मोलैं ॥ [1]
हास विलास रास राधे सँग, सील आपनौ तोलैं ।
श्रीभट जदपि मदन मोहन तउ, हारि-हारि सिर डोलैं ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (68)
(दोहा)
प्रेम के वशीभूत हो मनमोहन श्रीश्यामसुन्दर श्रीराधा-नाम का बारम्बार उच्चारण करते हैं। यद्यपि वे अपनी रूप-माधुरी की छटा से मदन के मन का भी मन्थन कर देते हैं, तथापि सरस रस-भरी श्रीराधिका की मंजुल छवि के दर्शन कर उनकी प्रीति-रीति के वशीभूत हो राधा-नाम की माला फेरने लगते हैं।
उनकी इस प्रेम विह्वल दशा का वर्णन करते हुए श्रीभट्टजी कहते हैं-
(पद)
रास विलास के समय नागरी श्रीप्रियाजी की नृत्य मुद्रा की छटा का दर्शन तथा मधुर स्वर लहरी का श्रवण कर श्रीलालजी अद्भुत प्रीति रीति के वशीभूत हो जाते हैं, उनका हृदय प्रेमाभिभूत हो उठता है। वे प्रेम रस के बन्धन में इस भाँति बंध जाते हैं मानो श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपने प्रेम के बदले में खरीद लिया हो। [1]
वे रात के समय श्रीराधिकाजी के साथ की गई हास-विलासादि क्रीडाओं के समक्ष अपने शील (सहज सुन्दर स्वभाव को तोलते हैं), अर्थात् मन को बार बार अपने काबू में करना चाहते हैं, फिर भी यह अस्थिर ही बना रहता है और प्रेम रस सागर में गोते खाने लगते हैं ।
श्रीभट्टजी सखी स्वरूप में इस परमसुख का आस्वादन कर कहते हैं कि श्रीश्यामसुन्दर यद्यपि मन्मथ मन्मथ हैं अर्थात् काम के मन का भी मन्थन कर उसका सम्मोहन करने वाले हैं, फिर भी श्रीप्रिया के रूप की अद्भुत शोभा का दर्शन कर, उनके वशीभूत हो जाते हैं। वे उनके समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेते हैं । अपनी सुध-बुध खो बार-बार माथे को डुलाते हुए अपने मुख से श्रीराधानाम का पुनः पुनः उच्चारण करने लगते हैं । [2]
प्रीति रीति रस बस भये, जदपि मनोहर मैन ।
तदपि रटैं निज मुष सदा, श्रीराधे राधे बैन॥
(पद) [ताल-चम्पक, राग - केदारौ]
मोहन राधे राधे बैन बोलें ।
प्रीति रीति रस बस नागरि हरि लियौ प्रेम के मोलैं ॥ [1]
हास विलास रास राधे सँग, सील आपनौ तोलैं ।
श्रीभट जदपि मदन मोहन तउ, हारि-हारि सिर डोलैं ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (68)
(दोहा)
प्रेम के वशीभूत हो मनमोहन श्रीश्यामसुन्दर श्रीराधा-नाम का बारम्बार उच्चारण करते हैं। यद्यपि वे अपनी रूप-माधुरी की छटा से मदन के मन का भी मन्थन कर देते हैं, तथापि सरस रस-भरी श्रीराधिका की मंजुल छवि के दर्शन कर उनकी प्रीति-रीति के वशीभूत हो राधा-नाम की माला फेरने लगते हैं।
उनकी इस प्रेम विह्वल दशा का वर्णन करते हुए श्रीभट्टजी कहते हैं-
(पद)
रास विलास के समय नागरी श्रीप्रियाजी की नृत्य मुद्रा की छटा का दर्शन तथा मधुर स्वर लहरी का श्रवण कर श्रीलालजी अद्भुत प्रीति रीति के वशीभूत हो जाते हैं, उनका हृदय प्रेमाभिभूत हो उठता है। वे प्रेम रस के बन्धन में इस भाँति बंध जाते हैं मानो श्रीप्रियाजी ने उन्हें अपने प्रेम के बदले में खरीद लिया हो। [1]
वे रात के समय श्रीराधिकाजी के साथ की गई हास-विलासादि क्रीडाओं के समक्ष अपने शील (सहज सुन्दर स्वभाव को तोलते हैं), अर्थात् मन को बार बार अपने काबू में करना चाहते हैं, फिर भी यह अस्थिर ही बना रहता है और प्रेम रस सागर में गोते खाने लगते हैं ।
श्रीभट्टजी सखी स्वरूप में इस परमसुख का आस्वादन कर कहते हैं कि श्रीश्यामसुन्दर यद्यपि मन्मथ मन्मथ हैं अर्थात् काम के मन का भी मन्थन कर उसका सम्मोहन करने वाले हैं, फिर भी श्रीप्रिया के रूप की अद्भुत शोभा का दर्शन कर, उनके वशीभूत हो जाते हैं। वे उनके समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर लेते हैं । अपनी सुध-बुध खो बार-बार माथे को डुलाते हुए अपने मुख से श्रीराधानाम का पुनः पुनः उच्चारण करने लगते हैं । [2]

