श्री वृंदावन माधुरी - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (54)

श्री वृंदावन माधुरी - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (54)

श्री वृंदावन माधुरी, निरखि रूप गुन गान।
प्यारी पीय सखी निजु सदा, मेरी जीवनि प्राण॥

- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (54)

मैं सदा श्री वृन्दावन की माधुरी को निरख-निरखकर उसका गुणगान करता रहूँ। श्री राधा, श्री कृष्ण और उनकी निज सखियाँ ही मेरे जीवन-प्राण हैं।