व्यास आस इत जगतकी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (133)

व्यास आस इत जगतकी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (133)

व्यास आस इत जगतकी, उत चाहत हिय स्याम।
निलज अधम सकुचत नहीं, चाहत है अभिराम॥

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (133)

जो इस संसार की भौतिक तृप्ति की इच्छा रखता है और साथ ही श्रीकृष्ण की भक्ति की कामना भी करता है, वह निर्लज्ज पतित है क्योंकि वह संसार के नश्वर भोग और परमात्मा का आनन्द दोनों एक साथ चाहता है।