प्यारी मोहिं ऐसौ जीवन भावै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

प्यारी मोहिं ऐसौ जीवन भावै - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

प्यारी मोहिं ऐसौ जीवन भावै।
आलस भरी लता के गृह में, रचि शैया पौढ़ावै॥ [1]
तुम सोवौ मैं ब्यार डुलावौं, भाग्य कह्यौ नहिं जावै।
तुम हूँ अकेली मैं हूँ अकेली, आनँद उर न समावै॥ [2]
बार-बार छबि देखि-देखि कैं, उमगि नैंन भरि आवै।
‘भोरी' भुक्ति-मुक्ति नहिं चाहत, छिन इक वह सुख पावै॥ [3]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (137)

हे प्यारी जू! मुझे इस प्रकार का जीवन व्यतीत करना अत्यधिक रुचिकर लगता है, यथा - जब आप नींद के आलस्य से भरी हुई हों, तब लता मन्दिर में सुखद शैया की रचना करने के पश्चात् आपको वहाँ ले जाकर शयन कराऊँ। [1]

जब आप सो जाँय, तब पंखे से आपकी हवा कर अपने सौभाग्य की सराहना करूँ; जब हम दोनों एकान्त में बैठे हुए हों, तब एक दूसरे से मीठी-मीठी रस भरी बातें करते हुए मुझे असीमित आनन्दकी उपलब्धि हो। [2]

तथा आपकी अद्भुत छबि को देख-देखकर मेरी आँखों से प्रेमाश्रु ढलकने लगें। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि यदि ऐसा सुख एक क्षण के लिये भी मिल जाय, तो उस सुख की तुलना में भुक्ति और मुक्ति का सुख भी नगण्य है। [3]