आपाययित्वाधरसंश्रितं मधु स्ववक्त्रनिःसारितवीटिकार्पणात् ।
स्वमालिकान्तश्च विधाय माधवं रराम राधा रसकेलिलंपटा ॥
- श्री वृषभानुपुर शतक (46), श्री वंशी अली द्वारा रचित
श्रीलाड़िलीजी बीड़ी (ताम्बूल) चर्वण कर रही हैं, उस बीड़ी को अपने मुख से निकालकर लालजी को अर्पित कर रही हैं और लालजी उन किशोरीजी के श्रीमुख से चर्वित पान को अपने मुखारविन्द में ले रहे हैं, इसी व्याज (बहाने) से वे प्रियतम को अधराश्रित मधु का पान करा रहीं हैं ।

