बांके विरदनि विदित बिहारी। [1]
इच्छा-विग्रह धरि लीला वपु, सब अवतारनि के अवतारी।
लक्ष्मीपति ब्रजपति कों दुर्लभ, उनसे कौन बड़ौ अधिकारी॥ [2]
नित्य किसोर निरन्तर बिहरत, सेवत श्री हरिदास दुलारी।
ऐंडिल ऐंडाइल अरुन कमल बांके विरदनि विदित बिहारी॥ [3]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (28)
श्री बिहारीजी अपने 'बाँके' इस विरद से प्रसिद्ध हैं। [1]
यद्यपि श्री बांके बिहारी के अंश से ही समस्त अवतार होते हैं तथापि नित्य विहार लीला आस्वादन हेतु श्री बिहारी जी वपुः धारण करते हैं।
लक्ष्मीपति विष्णु और ब्रजपति श्रीकृष्ण के लिए भी ये [नित्यविहार रस एवं बिहारीजी का स्वरूप] दुर्लभ हैं, यद्यपि इन दोनों से बड़ा और कोई अधिकारी नहीं है। [2]
नित्य किशोर श्री श्यामाश्याम नित्य ही विहार करते हैं एवं श्री कृष्ण श्री हरिदास दुलारी अर्थात श्री राधा की नित्य ही सेवा में उपस्थित हैं।
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि श्री श्यामा जू के नेत्र अत्यंत प्रेम के गर्व में अरुण हो गए हैं तथापि श्री श्यामाश्याम का प्रेम इतना बांका है की संयोग स्थिति में भी विरह का आभास हो रहा है। [3]
इच्छा-विग्रह धरि लीला वपु, सब अवतारनि के अवतारी।
लक्ष्मीपति ब्रजपति कों दुर्लभ, उनसे कौन बड़ौ अधिकारी॥ [2]
नित्य किसोर निरन्तर बिहरत, सेवत श्री हरिदास दुलारी।
ऐंडिल ऐंडाइल अरुन कमल बांके विरदनि विदित बिहारी॥ [3]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (28)
श्री बिहारीजी अपने 'बाँके' इस विरद से प्रसिद्ध हैं। [1]
यद्यपि श्री बांके बिहारी के अंश से ही समस्त अवतार होते हैं तथापि नित्य विहार लीला आस्वादन हेतु श्री बिहारी जी वपुः धारण करते हैं।
लक्ष्मीपति विष्णु और ब्रजपति श्रीकृष्ण के लिए भी ये [नित्यविहार रस एवं बिहारीजी का स्वरूप] दुर्लभ हैं, यद्यपि इन दोनों से बड़ा और कोई अधिकारी नहीं है। [2]
नित्य किशोर श्री श्यामाश्याम नित्य ही विहार करते हैं एवं श्री कृष्ण श्री हरिदास दुलारी अर्थात श्री राधा की नित्य ही सेवा में उपस्थित हैं।
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि श्री श्यामा जू के नेत्र अत्यंत प्रेम के गर्व में अरुण हो गए हैं तथापि श्री श्यामाश्याम का प्रेम इतना बांका है की संयोग स्थिति में भी विरह का आभास हो रहा है। [3]

