राधारूपविलासान् समधिक माधुरीधुरभरितान्।
अपि वचसापि गृहणन्नहमिह वृन्दाकाननेऽस्मि निश्चिन्तः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.87)
अतिशय माधुर्यधारपूर्ण श्रीराधा रूप-विलासादि का गान करते हुए मैं इस श्रीवृन्दावन में निश्चिन्त हो गया हूँ।
अपि वचसापि गृहणन्नहमिह वृन्दाकाननेऽस्मि निश्चिन्तः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.87)
अतिशय माधुर्यधारपूर्ण श्रीराधा रूप-विलासादि का गान करते हुए मैं इस श्रीवृन्दावन में निश्चिन्त हो गया हूँ।

