राधा प्यारी! तू रसरंग भरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (782)

राधा प्यारी! तू रसरंग भरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (782)

(राग ललित)
राधा प्यारी! तू रसरंग भरी।
मैं जानी इहिं फौज मदन की, लूटलई सगरी॥ [1]
अटपटे भूषन, रंगमंगी अगिया अलकाबलि बिथुरी।
'कृष्णदास' प्रभु गिरिधर पिय संग, रतिरस केलि करी॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (782)

हे श्री राधा प्यारी जू, आज आप प्रेम रस के रंग से ओत प्रोत हैं। मैंने जाना है आपने निश्चित ही कोटि कोटि कामदेवों की फ़ौज के गर्व को भंग किया है। [1]

हे श्री राधे, आपके भूषण अटपटे हैं, आपके वस्त्र रस में डूबे से [शिथिल] लग रहे हैं एवं आपके केश अलकावलि बिखरी हुई है। श्री कृष्णदास जी कहते हैं "निश्चित ही आपने सम्पूर्ण रात्रि अपने पिय श्री गिरिधर प्रभु संग प्रेम रस परिपूर्ण केलि करी है ।" [2]