पग-पग कोटि प्रयाग सम, केलिकुञ्ज के बीच।
मृग तृष्णा जग छोड़कें, वृन्दावन रस सीच॥
- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (187)
कोटि-कोटि तीर्थों से संपन्न तीर्थराज प्रयाग भी श्री वृन्दावन के केलि-कुञ्जों में पग-पग पर शरण ग्रहण करता है; इसलिए जगत की समस्त मृग-तृष्णाओं का त्याग कर श्री वृन्दावन का आश्रय लेना और वृन्दावन-रस का ग्रहण करना चाहिए।
मृग तृष्णा जग छोड़कें, वृन्दावन रस सीच॥
- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (187)
कोटि-कोटि तीर्थों से संपन्न तीर्थराज प्रयाग भी श्री वृन्दावन के केलि-कुञ्जों में पग-पग पर शरण ग्रहण करता है; इसलिए जगत की समस्त मृग-तृष्णाओं का त्याग कर श्री वृन्दावन का आश्रय लेना और वृन्दावन-रस का ग्रहण करना चाहिए।

