संभु सुर ध्यावैं सदा सेस गुन गावै विधि - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (55)

संभु सुर ध्यावैं सदा सेस गुन गावै विधि - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (55)

संभु सुर ध्यावैं सदा सेस गुन गावै विधि,
पारहू न पावैं जे कहैया बेद बानी के। [1]
परम पद पायकै चढ़ायवे कौं लायक हैं,
जन सुखदायक सहाय दधि दानी के॥ [2]
मुकति के मालिक अतालिक हैं सिद्धन के,
दीन प्रतिपालिक रखैया हठी पानी के। [3]
जोग जज्ञ जप तप कछूवै न साधे ऐसे,
पद अवराधे हम राधे महारानी के॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (55)

भगवान शिव तथा समस्त देवगण श्री राधारानी का निरंतर ध्यान करते हैं। शेषनाग उनके दिव्य गुणों का गान करते हैं, और जिनके मुख से वेद उद्भूत हुए हैं, वे स्वयं ब्रह्मा भी उनके महिमामंडल का पार पाने में असमर्थ रहे। [1]

यदि परम पद को प्राप्त भी कर लिया तो भी क्या प्राप्त किया, यह तो श्री राधा के चरणों में अर्पित करने लायक है, जो समस्त जीवों को सुख प्रदान करतीं हैं एवं जो अपनी लीलाओं द्वारा श्री कृष्ण [दधिदानि] को भी सुख प्रदान करती हैं। [2]

श्री राधा मोक्ष की प्रदायिनी हैं, सिद्धों की परम गुरु हैं, दीनों की पालनहार हैं और अपने शरणागतों को शरण प्रदान करने वाली करुणामयी स्वामिनी हैं। [3]

श्री हठी जी महाराज कहते हैं कि मैंने न योग साधना की, न यज्ञ-हवन किया, न मंत्र जप और न तपस्या। मैंने तो एकमात्र श्री राधारानी के चरण कमलों की ही आराधना की है। [4]