मेरी राधेरानी प्रेम रूप रस खानी,
जाकी करे पूर्ण ब्रह्म श्याम अगवानी। [1]
मेरी ऐसी राधेरानी ब्रजरसखानी,
जाके पाछे पाछे डोलें सारँगपानी ।। [2]
मेरी राधारानी प्रेमरूप रसखानी,
जय हो जय हो जय हो वृंदावन ठकुरानी। [3]
मेरी ऐसी राधारानी, ब्रज ठकुरानी,
जेहि हरि ने भी निज स्वामिनि मानी ।। [4]
अब लौं रही मैं अनजानी अब जानी,
मेरी तो है गति मति रति राधेरानी। [5]
तू तो सदा ते 'कृपालु' अवढ़रदानी,
काहे अब राधारानी करो आना कानी ।। [6]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी (3.106)
मेरी राधारानी प्रेम, सौंदर्य और रस की खान हैं। जिनके स्वागत में सदैव पूर्ण ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण प्रस्तुत रहते हैं। [1]
मेरी स्वामिनी श्री राधारानी [ब्रज रस की खान] ऐसी हैं कि श्री कृष्ण सदैव उनका अनुगमन करते हैं जहाँ भी वे जातीं हैं। [2]
मेरी राधारानी प्रेम, सौंदर्य और रस की खान हैं। वृंदावन की महारानी, श्री राधा रानी की जय। [3]
ब्रज की महारानी मेरी स्वामीनी श्री राधेरानी ऐसी हैं कि भगवान कृष्ण भी उन्हें अपनी स्वामीनी स्वीकार करते हैं। [4]
मैं अब तक अज्ञानी था लेकिन अब मैं अच्छी तरह से जान गया हूँ कि श्री राधा ही मेरी सब कुछ हैं [अर्थात मेरी बुद्धि, मेरे ह्रदय का प्रेम एवं मेरा अंतिम लक्ष्य ]। [5]
श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "हे श्री राधारानी, आप नित्य ही उदार हैं; अब आप कृपा करने में क्यों झिझक रही हो।" [6]
मेरी राधारानी प्रेम, सौंदर्य और रस की खान हैं। जिनके स्वागत में सदैव पूर्ण ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण प्रस्तुत रहते हैं। [1]
मेरी स्वामिनी श्री राधारानी [ब्रज रस की खान] ऐसी हैं कि श्री कृष्ण सदैव उनका अनुगमन करते हैं जहाँ भी वे जातीं हैं। [2]
मेरी राधारानी प्रेम, सौंदर्य और रस की खान हैं। वृंदावन की महारानी, श्री राधा रानी की जय। [3]
ब्रज की महारानी मेरी स्वामीनी श्री राधेरानी ऐसी हैं कि भगवान कृष्ण भी उन्हें अपनी स्वामीनी स्वीकार करते हैं। [4]
मैं अब तक अज्ञानी था लेकिन अब मैं अच्छी तरह से जान गया हूँ कि श्री राधा ही मेरी सब कुछ हैं [अर्थात मेरी बुद्धि, मेरे ह्रदय का प्रेम एवं मेरा अंतिम लक्ष्य ]। [5]
श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "हे श्री राधारानी, आप नित्य ही उदार हैं; अब आप कृपा करने में क्यों झिझक रही हो।" [6]

