रेरे संसारमग्नाश्च शिष्या मे - स्कंद पुराण [वैष्णवखण्डः] (2.18.32)

रेरे संसारमग्नाश्च शिष्या मे - स्कंद पुराण [वैष्णवखण्डः] (2.18.32)

रेरे संसारमग्नाश्च शिष्या मे शृणुताऽपरे ।।
यदीच्छथ सुखं सांद्रं वासं कुरुत मत्पुरीम् ।।
- स्कंद पुराण [वैष्णवखण्डः] (2.18.32)

हे संसार में मग्न जीव ध्यान से सुन! यदि दिव्य आनंद प्राप्त करने की इच्छा है तो ब्रज में नित्य वास कर ।