आयौ कर संतन की संगत में बार बार,
सदाँ पद पंकज में सीस कौं नवायौ कर। [1]
न्हायौ कर प्यारे मारतण्ड तनया में जाय,
रज कों लगाय अंग अंग हुलसायौ कर॥ [2]
पायौ कर प्रभु के प्रसाद को प्रसन्न है कैं,
नेम वनराज जू की परिक्रमा जायौ कर। [3]
लायौ कर ध्यान मन मगन होय हृदै बीच,
बैठकँ निकुंजन में राधा गुन गायौ कर॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (41)
बार बार रसिक संतों की संगति में आया कर, एवं सदा उनके चरण कमलों में शीश को झुकाया कर। [1]
प्यारे! श्री यमुना [सूर्य पुत्री] के शीतल जल में जाकर नहाया कर एवं श्री धाम वृंदावन की रज, जो साक्षात श्री प्रिया प्रियतम के चरण चिन्हों से अलंकृत है, उसको अंग अंग में लगाकर हुलसाया कर। [2]
प्रसन्न चित्त से प्रभु का प्रसाद प्राप्त कर एवं प्रतिदिन वृंदावन धाम की परिक्रमा करने जाया कर। [3]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि हृदय की गहराइयों से श्री राधा रानी के ध्यान में मगन होकर वृंदावन की निकुंजों में बैठ कर श्री राधा गुण गाया कर। [4]

