अहो लडैति प्राणपियारी श्रीवन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (83)

अहो लडैति प्राणपियारी श्रीवन - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (83)

(राग परज)
अहो लडैति प्राणपियारी, श्रीवन कवै बसावोगी ।
रसिकराय प्रीतम संग राधे, मधुरी तान सुनावोगी ॥ [1]
दोना ललित कदम के माहीं, दधि मेरे कर पावोगी ।
ललितकिशोरी लालन मुख दै, जूठन मुहूँ खवावोगी ॥ [2]   
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (83)

हे प्राणप्यारी किशोरीजी! आप मुझे कब श्री वृन्दावन धाम में बसाएँगी? हे श्री राधे! कब आप रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुंदर के साथ मुझे माधुरी तान सुनाएँगी? [1]

हे राधे! कब आप कदम की डाली के नीचे मेरे कर-कमलों से दही पिएँगी? श्री ललित किशोरी जी कहते हैं—कब पुनः आप श्रीलालजी के अधर से लगाकर मुझे अपना अमृत तुल्य झूठन खिलाएँगी? [2]