बिहरत दोऊ लाड़िली लाल ।
निरखि निरखि सिरात हिय लोचन, लोइन ललित विशाल ।। [1]
हँसत लसत अति छबि परस्पर, शशि से शोभित भाल ।
जैश्रीकमलनैंन हित प्रेम रँग भीने, संतत रूप रसाल ।। [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (43)
श्री लाड़िली लाल दोनों वृंदावन में विहार परायण हैं । श्री श्यामा श्याम के बड़े एवं सुंदर नैनों को देख देख देख सहचरियों के हृदय और नयन शीतल बने रहते हैं । [1]
हंसते विलसते हुए यह अद्बुत छवी बिखेर रहे हैं जिनके भाल चंद्र समान दिखाई पड़ रहे हैं । श्री हित कमल नैंन जी कहते हैं कि यह दिव्य जोड़ी जिनकी रूप माधुरी नित्य ही रसीली है वह प्रेम रंग में भीनी हुई है । [2]

