संस्पृश्य तत्पादतलं किशोरकः  - श्री वृषभानुपुर शतक (37)

संस्पृश्य तत्पादतलं किशोरकः - श्री वृषभानुपुर शतक (37)

संस्पृश्य तत्पादतलं किशोरकः किशोरिकायाः करकंज-भङ्गिभिः ।
लब्धं मरंदं प्रविलाप्य नेत्रयोः स्वयोर्न तृप्तः पुनरेव वाञ्छति ॥

- श्री वृषभानुपुर शतक (37), श्री वंशी अली द्वारा रचित

नवल किशोर अपने हस्तकमल की भङ्गिमाओं द्वारा श्रीकिशोरीजी के चरणकमल का स्पर्श करके, चरणकमल से मकरन्द-रज को अपने नेत्रों से लगा रहे हैं पुनरपि वे तृप्त नहीं हो रहे हैं, पुनः पुनः श्रीकिशोरीजी के पद-रज की कामना कर रहे हैं ।