श्री बिहारी दास विहार कौं, लक्ष्मीपति ललचाई।
ए देव पितर लीनें फिरै, ह्वाँ राम कृष्ण न समाई॥
- श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (236)
नित्य-विहार रूपी यह दुर्लभ रस ऐसा है कि इसके लिए साक्षात भगवान विष्णु भी तरसते हैं। जीव यहाँ पितरों और देवताओं की भक्ति में लगे रहते हैं, जबकि निकुञ्ज से पृथक भगवान राम और भगवान कृष्ण के लिए भी यह रस अत्यन्त दुर्लभ है।

