(राग गौरी)
कहा करों बैकुंठहि जाय ।
जहां नहीं वंशीवट यमुना गिरिगोवर्धन नन्द की गाय ।। [1]
जहां नहीं यह कुंज लता द्रुम मंद सुगंध बहत नहीं वाय ।
कोकिल हंस मोर नहीं कूजत, ताको बसिबो काहि सुहाय ।। [2]
जहाँ नहीं वंशी धुनि बाजत कृष्ण न पुरवत अधर लगाय ।
प्रेम पुलक रोमांच न उपजत, मन वच क्रंम आवत नहीं धाय ।। [3]
जहाँ नहीं यह भुवि वृन्दावन, बाबा नन्द यशोमति माय ।
'गोविन्द' प्रभु तजि नन्द सुवन को, ब्रज तजि वहाँ मेरी बसै बलाय ।। [4]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (574)
मैं वैकुंठ जाकर क्या करूँगा जहां न वंशीवट है, न यमुना जी हैं, न गोवर्धन है और न ही नंद की गाय हैं । [1]
ब्रज की तरह जहां न तो लता कुंज हैं जहां ऐसे सुंदर वृक्ष हैं एवं न ही ऐसी शीतल व सुगंधित हवा बहा करती है । जहां न कोयल, हंस, मोर इत्यादि की सुंदर स्वर सुनाई पड़ते हैं वहाँ बसना मुझे कैसे सुहा सकता है? [2]
जहां प्रेम विभोर होकर श्री कृष्ण वंशी को अपने अधरों से लगाकर मधुर धुनि नहीं बजाते, जहां प्रेम में विभोर होकर पुलक, रोमांच इत्यादि पैदा नहीं होता । ऐसे रस को छोड़कर जहां मन, वचन एवं कर्म से भी जाने की इच्छा नहीं होती । [3]
जहां न वृन्दावन भूमि है, न नंद बाबा एवं यशोदा माता है, न ही नंद सुवन श्री कृष्ण हैं ऐसे ब्रज को त्याग कर मेरी बलाय [दुःख, विपत्ति] आदि ही बैकुंठ वास करे [मैं तो नित्य ब्रज में ही रहूँ यही मेरी कामना है] । [4]
कहा करों बैकुंठहि जाय ।
जहां नहीं वंशीवट यमुना गिरिगोवर्धन नन्द की गाय ।। [1]
जहां नहीं यह कुंज लता द्रुम मंद सुगंध बहत नहीं वाय ।
कोकिल हंस मोर नहीं कूजत, ताको बसिबो काहि सुहाय ।। [2]
जहाँ नहीं वंशी धुनि बाजत कृष्ण न पुरवत अधर लगाय ।
प्रेम पुलक रोमांच न उपजत, मन वच क्रंम आवत नहीं धाय ।। [3]
जहाँ नहीं यह भुवि वृन्दावन, बाबा नन्द यशोमति माय ।
'गोविन्द' प्रभु तजि नन्द सुवन को, ब्रज तजि वहाँ मेरी बसै बलाय ।। [4]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (574)
मैं वैकुंठ जाकर क्या करूँगा जहां न वंशीवट है, न यमुना जी हैं, न गोवर्धन है और न ही नंद की गाय हैं । [1]
ब्रज की तरह जहां न तो लता कुंज हैं जहां ऐसे सुंदर वृक्ष हैं एवं न ही ऐसी शीतल व सुगंधित हवा बहा करती है । जहां न कोयल, हंस, मोर इत्यादि की सुंदर स्वर सुनाई पड़ते हैं वहाँ बसना मुझे कैसे सुहा सकता है? [2]
जहां प्रेम विभोर होकर श्री कृष्ण वंशी को अपने अधरों से लगाकर मधुर धुनि नहीं बजाते, जहां प्रेम में विभोर होकर पुलक, रोमांच इत्यादि पैदा नहीं होता । ऐसे रस को छोड़कर जहां मन, वचन एवं कर्म से भी जाने की इच्छा नहीं होती । [3]
जहां न वृन्दावन भूमि है, न नंद बाबा एवं यशोदा माता है, न ही नंद सुवन श्री कृष्ण हैं ऐसे ब्रज को त्याग कर मेरी बलाय [दुःख, विपत्ति] आदि ही बैकुंठ वास करे [मैं तो नित्य ब्रज में ही रहूँ यही मेरी कामना है] । [4]

