(राग नट)
देखौ अद्भुत प्रीति की चालहि ।
सुनि सखी पियहि प्यार सौं प्यारी, राखति ज्यौं उर मालहि ।।[1]
ह्वै-ह्वै जात विवस मनमोहन, निरखि नैंन नव-बालहि ।
'हित ध्रुव' सरस मधुर अधरामृत, प्याइ जिवावति लालहि ।।[2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (60)
नव निकुंज देश की कोई सहचरी अपनी सहेली से कहती है - हे सखी ! प्रीति की अध्भुत गति का अवलोकन तो करो, जहॉ प्रिया अपने प्रियतम को प्रीति पूर्वक हृदय पर ऐसे धारण करती है जैसे कोई माला को धारण करता है । [1]
नव बाला सुंदरी प्रिया के नेत्रों में स्थित प्रेम का अवलोकन करके प्रियतम मोहन प्रीति से बारम्बार विवश हो जाते है । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि उनकी विवशता को देख करुणामयी प्रिया सरस अवं मधुमय अमृत देकर उन्हें जीवन धारण कराती हैं । [2]

