श्रीराधे राधे जो जन कहै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)

श्रीराधे राधे जो जन कहै - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)

श्रीराधे राधे जो जन कहै, महा प्रेम रस सोई लहै।
प्रिया लाल तिनके सुख ढरैं, रीझि रीझि अंक में भरैं॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (182)

जो जन सच्चे मन से सर्वोपरि नित्यविहारिनी जू के ‘श्री राधे-राधे’ नाम का ही नित्य रटन करते हैं, वही श्री निकुञ्ज-मन्दिर के सर्वोपरि विहार के प्रेम-रस को प्राप्त करते हैं। साक्षात् श्री युगल [राधा-कृष्ण] ही उनके सुख के लिए रीझ-रीझकर उन्हें अंक में भर लेते हैं।