मानि तूब चलि री एक संग रह्यौ कीजै - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (16)

मानि तूब चलि री एक संग रह्यौ कीजै - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (16)

(राग कान्हरौ)
मानि तूब चलि री एक संग रह्यौ कीजै ।
तौ कीजै जो बिन देखे जीजै ॥ [1]
ये स्याम घन तुम दामिनी प्रेम पुंज बरषा रस पीजै ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी सौं
हिलि मिलि रंग लीजै ॥ [2]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (16)

सखी श्री राधे की मान की सम्भावना देख बोली - नयन बाँके कर कहाँ चली, हे मानिनी, आप दोनों एक संग रहें। ऐसा तभी कीजिए यदि आप उनके बिना जी सकती हैं । प्रिय [कृष्ण] तुम बिना, तुम [राधा] इनके बिना नहीं रह सकतीं । [1]

श्यामसुंदर तो श्याम घन हैं, आप दामिनी हैं, आप दोनों अंग-अंग संग कर अपार प्रेम रस की वर्षा करें एवं उसी रस का आस्वादन करें ।
श्री हरिदासी सखी कहते हैं: हे हरिदासी की स्वामिनी आप कुंज बिहारी से हिल मिल जाओ, एक हो जाओ, और रस रंग लो। [2]