व्रजन्तीं स्ववृन्दावने नित्यकालं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (5)

व्रजन्तीं स्ववृन्दावने नित्यकालं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (5)

व्रजन्तीं स्ववृन्दावने नित्यकालं, मुकुन्देन साकं विधायाङ्कमालम्।
समामोक्ष्यमाणाऽनुकम्पाकटाक्षैः, श्रियं चिन्तयेत्सच्चिदानन्दरूपाम्॥

- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (5)

जो प्रतिदिन नियत समय पर श्री श्यामसुन्दर के साथ उन्हें अपने अंक की माला अर्पित करके अपनी लीलाभूमि-वृंदावन में विहार करती हैं, भक्तजनों पर प्रयुक्त होने वाले कृपा-कटाक्षों से सुशोभित उन सच्चिदानन्दस्वरूपा श्री लाड़िली का सदा चिन्तन करे।