सुकुमारिता देखि कुमारी लजैं - ब्रज के सेवैयाँ

सुकुमारिता देखि कुमारी लजैं - ब्रज के सेवैयाँ

सुकुमारिता देखि कुमारी लजैं, छल छन्द दिखे जिमि चोरन के। [1]
यमुना तट गोपिन रोकते हो, कर कौतुक भौंह मरोरन के॥ [2]
अति चंचल नैनन हेरि हँसौ, बहु बात करौ रस बोरन के। [3]
जो नन्दलाल तुम होते लली, तो गरे कटि जाते करोरन के॥ [4]

- ब्रज के सवैयाँ

श्रीकृष्ण ने जब गोपी का रूप धारण किया और अपनी सुकुमार सुंदरता दिखलाई, तब वास्तविक गोपियाँ भी लज्जित हो गईं, जैसे कोई चालाक चोर को देखकर चौंक जाए।

गोपी-वेशधारी श्रीकृष्ण यमुना तट पर खड़ी गोपियों का मार्ग रोककर, भौंहों को मरोड़ते हुए और नखरे करते हुए तरह-तरह के हास्यपूर्ण कौतुक करने लगे। [2]

उनके चंचल नेत्र और हँसी, रस से भरी चुटीली बातें सुनकर सभी गोपियाँ मुग्ध हो गईं। वे कृष्ण की अद्भुत गोपी छवि से चकित थीं। [3]

हँसते हुए गोपियाँ कहती हैं—“हे नंदलाल! यदि तुम वास्तव में स्त्री होते, तो तुम्हारे रूप और अदाओं पर मोहित होकर आशिकों की टोली तुम्हारे पीछे-पीछे घूमती और तुम्हें पाने के लिए करोड़ों लोगों की बलि चढ़ जाती”। [4]