चाँपत चरन मोहनलाल - श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (272)

चाँपत चरन मोहनलाल - श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (272)

(राग केदारौ व विभास)
चाँपत चरन मोहनलाल ।
पलंग पौढ़ी कुँवरि राधा नागरी नव-बाल ।। [1]
लेत कर धरि परसि नैंननि, हरषि लावत भाल।
लाइ राखत हृदैसौं तय गनत भाग विसाल ।। [2]
देखि पियकी अधीनता भई कृपासिंधु दयाल ।
‘व्यास’ स्वामिनी लिये भुज भरि, अति प्रवीन कृपाल ।। [3]

- श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (272)

नव नागरी बाल श्री स्वामिनिजी [राधा] अपने पलंग में विश्राम कर रही हैं और श्री मोहन लाल श्री राधिका के चरण दबा रहे हैं । [1]

बहुत ही प्रेम से श्री कृष्ण स्वामिनी जी के कमल चरणों को नैंनों से परस करवाते हैं, पुनः हर्ष में उन्मत्त हो कर अपने मस्तक से लगाते हैं । श्री कृष्ण श्री किशोरी जी के चरणों को अपने हृदय से लगाए रखते हैं और ऐसा सोचते हैं कि मेरा इतना बड़ा भाग्य है कि मुझे किशोरी जी के चरणों में सेवा एवं स्थान मिल गया । [2]

पिय श्याम सुंदर की आधीनता देख, परम कृपालु स्वामिनी अत्यंत दया से भर जाती हैं । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि “अति प्रवीन कृपालु मेरी स्वामिनी [श्री राधा] श्री श्याम सुंदर के सुंदर भाव से रीझ कर उन्हें अपनी भुजाओं में भर लेती हैं ”। [3]