बृन्दावन बसि यह सुख लीजै ।
सात समय की महल टहल बिनु, इक छिन जान न दीजै ।। [1]
परम प्रेम की रासि रसिक जे, तिनही कौ सँग कीजै ।
निबिड निकुंज बिहार चारु अति, सुरस सुधा दिन पीजै।। [2]
और भजन-साधनमें मिथ्या, कबहूँ कान न छीजै।
दिन दुलराइ-लड़ाइ दुहुन को, ‘अलबेली’ अलि जीजै ।। [3]
- श्री अलबेली अलि
बृंदावन का वास करके यह सुख प्राप्त करिए । नित्य ही श्री राधा कृष्ण की महल टहल [सेवा] करिए, एवं एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दीजिए । [1]
परम प्रेम की राशि अर्थात् रसिक महापुरुषों का ही केवल संग कीजिए [किसी अन्य का भूल कर भी संग न करना] और निभृत निकुंज विहार परायण श्री राधा कृष्ण का सरस सुख दिन रात पीजिए ।
इसके अतिरिक्त समस्त अन्य भजन साधन को मिथ्या मान, अपना समय भूल कर भी व्यर्थ ना करना । श्री अलबेली अली जी कहते हैं कि दिन रात श्री राधा कृष्ण की अद्बुत जोरी को प्रेमपूर्वक हृदय से लाड़ लड़ाइए एवं वृंदावन का अद्बुत रस छक कर पीजिए । [3]
सात समय की महल टहल बिनु, इक छिन जान न दीजै ।। [1]
परम प्रेम की रासि रसिक जे, तिनही कौ सँग कीजै ।
निबिड निकुंज बिहार चारु अति, सुरस सुधा दिन पीजै।। [2]
और भजन-साधनमें मिथ्या, कबहूँ कान न छीजै।
दिन दुलराइ-लड़ाइ दुहुन को, ‘अलबेली’ अलि जीजै ।। [3]
- श्री अलबेली अलि
बृंदावन का वास करके यह सुख प्राप्त करिए । नित्य ही श्री राधा कृष्ण की महल टहल [सेवा] करिए, एवं एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दीजिए । [1]
परम प्रेम की राशि अर्थात् रसिक महापुरुषों का ही केवल संग कीजिए [किसी अन्य का भूल कर भी संग न करना] और निभृत निकुंज विहार परायण श्री राधा कृष्ण का सरस सुख दिन रात पीजिए ।
इसके अतिरिक्त समस्त अन्य भजन साधन को मिथ्या मान, अपना समय भूल कर भी व्यर्थ ना करना । श्री अलबेली अली जी कहते हैं कि दिन रात श्री राधा कृष्ण की अद्बुत जोरी को प्रेमपूर्वक हृदय से लाड़ लड़ाइए एवं वृंदावन का अद्बुत रस छक कर पीजिए । [3]

