अब तो ऐसी चित्त धरि, जुगल चरन रँग राँचि।
महामाधुरी केलि गुन, छिन छिन गायऽरु नाचि॥
महामाधुरी केलि गुन, छिन छिन गायऽरु नाचि॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (18)
रे मन! तू ऐसा निश्चय कर कि अब मुझे श्री प्रिया-प्रियतम के चरणों के प्रेम में ही रंग जाना है। तत्पश्चात् तू प्रतिपल उन प्रिया-प्रियतम की अतिशय मधुर लीलाओं और गुणावली का गान कर तथा प्रेमपूर्वक नृत्य कर।

