(राग केदार)
पीय साँवरें के संगि बनी बिहारिनि अतिछबि पावे। [1]
नवसत साजे अंग सुभग छबि तरंग निरखत मोहिनी लजावे॥ [2]
बदन इंदु लजाइ मोहन रहे लुभाइ खेलत रास मंडल अतिहितु उपजावे। [3]
केवल बनी है जोरी नवल राधा किसोरी देख्यें रतिपति मुरछावे॥ [4]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (104)
साँवरे श्री कुञ्ज बिहारी के संग बिहारिनि श्री राधा की छवि अति ही सुन्दर शोभा को प्राप्त हो रही हैं। [1]
श्री राधा षोडश श्रृंगारों से अलंकृत है, और उनकी सुंदरता नित्य-नवीन मधुरता की तरंग उत्पन्न कर रही है, जिसे देखकर मोहिनी भी लज्जित हो जाती है। [2]
उनका मोहक मुख कमल चन्द्रमा को भी लज्जित कर देता है, श्री कृष्ण सदा ही उनके मोह पाश में बंधे रहते हैं; रास में नृत्य करते हुए, वे दिव्य प्रेम-आनंद की प्रचुर वर्षा करती हैं। [3]
श्री केवलराम जी कहते हैं, "यह नित्य किशोर (श्री राधा कृष्ण) अपनी अद्भुत छवि से कामदेव को भी लज्जित कर रहे हैं।" [4]
पीय साँवरें के संगि बनी बिहारिनि अतिछबि पावे। [1]
नवसत साजे अंग सुभग छबि तरंग निरखत मोहिनी लजावे॥ [2]
बदन इंदु लजाइ मोहन रहे लुभाइ खेलत रास मंडल अतिहितु उपजावे। [3]
केवल बनी है जोरी नवल राधा किसोरी देख्यें रतिपति मुरछावे॥ [4]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (104)
साँवरे श्री कुञ्ज बिहारी के संग बिहारिनि श्री राधा की छवि अति ही सुन्दर शोभा को प्राप्त हो रही हैं। [1]
श्री राधा षोडश श्रृंगारों से अलंकृत है, और उनकी सुंदरता नित्य-नवीन मधुरता की तरंग उत्पन्न कर रही है, जिसे देखकर मोहिनी भी लज्जित हो जाती है। [2]
उनका मोहक मुख कमल चन्द्रमा को भी लज्जित कर देता है, श्री कृष्ण सदा ही उनके मोह पाश में बंधे रहते हैं; रास में नृत्य करते हुए, वे दिव्य प्रेम-आनंद की प्रचुर वर्षा करती हैं। [3]
श्री केवलराम जी कहते हैं, "यह नित्य किशोर (श्री राधा कृष्ण) अपनी अद्भुत छवि से कामदेव को भी लज्जित कर रहे हैं।" [4]

