प्यारी श्रृंगार निज करसों बनायौ लाल - ब्रज के कवित्त

प्यारी श्रृंगार निज करसों बनायौ लाल - ब्रज के कवित्त

प्यारी श्रृंगार निज करसों बनायौ लाल,
सीस फूल लाल लाल भरी माँग रोरी की। [1]
लालन के हृदय कौ प्रकाश बनि बैंदी लाल,
बैठ्यौ पीय माथे लाल या सों छवि कोरी की॥ [2]
राधा मुख चन्द्र को प्रकाश दिस दसहु में,
कारौ तुम रंग मन करौ टेव चोरी की। [3]
साँच कहुँ कुमर बिलग जिन मानौ कछु,
झुकनि लौ झुकि है वृषभानु की किशोरी की॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

श्री श्यामसुंदर अपने हाथों से श्रीराधारानी का श्रृंगार कर रहे हैं। वह उनके सिर पर लाल फूल सजा कर उनकी माँग में लाल सिंदूर भर रहे हैं। [1]

श्री लाल जी के हृदय का प्रकाश ही मानो श्री राधिका की लाल बिंदी बन गया है, जो उनके माथे पर विराजमान है और उनकी सुंदरता की वृद्धि कर रहा है। [2]

श्रीराधाजी के मुख कमल का तेज चन्द्रमा के समान दसों दिशाओं में व्याप्त हो रहा है, श्री श्याम सुंदर श्याम वर्ण के हैं एवं हृदय को चुराने वाले हैं ! [3]

हे नित्य किशोर श्री कृष्ण, मैं सत्य कहता हूँ, आप स्वयं को तनिक भी विलग न मानना, श्री वृषभानु नंदिनी का झुकाव आपकी ओर है और आपके कंधे पर सिर रख रही हैं। [4]