ज्यों ज्यों राखो त्यों त्यों रहूँ जु देहु सु खाउँ - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)

ज्यों ज्यों राखो त्यों त्यों रहूँ जु देहु सु खाउँ - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)

(राग मालव गौड़)
ज्यों ज्यों राखो त्यों त्यों रहूँ जु देहु सु खाउँ।
तुमही मेरे पति गति लेउँ तेरो नाउँ॥ [1]
मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि छाड़िं प्रिय कौन पै जाऊँ।
कृष्णदास कहे या त्रिभुवन में तेरे द्वारे बिना हरि नाहीं कहूँ ठाऊँ॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)

हे मेरे प्यारे गिरिधर कृष्ण मुरारी ! आप जैसे जैसे मुझे रखो, वैसे वैसे ही मैं रहूँ, जो कुछ मुझे दो वही वही खाऊँ । तुम्हीं मेरे पति एवं गति हो, तुम्हारा ही नित्य नाम उच्चारण करूँ । [1]

हे मेरे प्राण प्यारे श्री गिरिधर लाल, तुम्हें छोड़ कर मैं अब किसके पास जाऊँ [आपकी शरण ग्रहण कर अब यह असम्भव है] । अब त्रिभुवन में तुम्हारे द्वार के बिना मेरा कोई और द्वार नहीं है ! [2]