नित्य विहार निरंतर मेरो ।
अद्भुत प्रेम रंग रस अद्भुत रूप सुधा कौ घेरौ।। [1]
ललित प्रिये सुख रासि रसिकवर ये कृपा करि छिन छिन हेरौ ।
दास बिहारिनि तन मन रांचो कोउ प्रसन्न रहौ कि रूठरौ ।। [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (102)
मेरे हृदय में नित्य विहार निरंतर बस गया है जो अद्भुत प्रेम रंग, अद्भुत रस एवं अद्भुत सुधा का सार तत्व है । [1]
रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, जो समस्त सुखों की राशि हैं, उन्हीं की कृपा से यह नित्य विहार रस बहुत ही सहजता से हमें हर क्षण प्राप्त हो रहा है । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि अब तो वह श्री बिहारिनि [श्री राधा] की दासता में उन्मत्त हो कर, तन मन से इस नित्य विहार का सेवन करते हैं, चाहे कोई प्रसन्न रहे चाहे कोई रूठे, उन्हें इस बात का अब कोई फ़रक नहीं पड़ता । [2]

