श्री हित वृन्दावन दास जी (चाचा जी) की जीवनी

श्री हित वृन्दावन दास जी (चाचा जी) की जीवनी

जन्म एवं बाल्यकाल :
ब्रज रस भक्ति धारा की रस वारिधी को और अधिक प्रखर करने में चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का जन्म 1694 में श्याम सुंदर की क्रीडा स्थली ब्रजधाम के किसी ग्रामाँंचल में गौड़-ब्राम्हण कुल में हुआ। आप बाल्यकाल से ही दिव्य गुणों से युक्त एवं प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे। 

आध्यात्मिक जीवन :
अलपव्यस् में ही आपको श्री किशोरी जी के रसमय, प्रेममय, मंगलमय, श्री वृंदावन धाम आश्चर्य का सुयोग प्राप्त हुआ। आप हितावतंश रासवंशीय गोस्वामी हरिलाल व्यास जी के आत्मज स्वनाम धन्य युगल रस अभिसिक्त गोस्वामी श्री हित रूपलाल के परम कृपापात्र शिष्य थे।

प्रसंग 1: [वृंदावन दास नाम एवं चाचा जी नाम से पुकारे जाना]:
वृंदावन दास नाम आपको गुरुदेव कृपा से प्राप्त है। बचपन में ही माता-पिता के साथ आर्थिक स्थिति सदृढ़ न होने के कारण श्री वृंदावन धाम आ गए और गोस्वामी श्री रूपलाल जी महाराज के आश्रय में रहने लगे। गुरुदेव भगवान की कृपा से ही संपूर्ण शास्त्रों का अध्ययन किया। कहते हैं कि आप जब गुरुदेव भगवान के गृह में निवास करते थे उस समय गुरुवर्य श्री रूपलाल जी के प्रिय पौत्र गोस्वामी श्री लाडली लालजी, जो कि युवा थे, आपको नाम लेकर पुकारते।  यह बात वृंदावन दास जी को पुत्रवत स्नेह एवं सम्मान देने वाले गुरु जी को उचित प्रतीत नहीं होती। इसलिए एक दिन गुरु जी ने अपने पौत्र को समझाते हुए कहा कि तुम इन्हें नाम से ना पुकार कर चाचा जी कहा करो। उसी समय से अन्य सभी लोग चाचा जी कहकर पुकारने लगे।
चाचा जी के मन में प्रवाहित यह रस वारिधि अब उच्छलित होना चाहता था।  परंतु स्वामिनी जू की एवं गुरु चरणों की अहैतु की कृपा के बिना यह कैसे संभव हो सकता है ? और परम करुणामयी श्री किशोरी जी तो सदा ही निज जनों की अभिलाषाओं को पूर्ण करती आई हैं।चाचा जी ने विरक्त वेष गुरुदेव भगवान श्री रूपलाल गोस्वामी जी के निकुंज गमन के पश्चात 64 वर्ष की आयु में ग्रहण किया था।

दिव्यानुभूति :
प्रसंग 1: अहमद शाह अब्दाली द्वारा वृंदावन पर आक्रमण

जब वृंदावन में यवनो का आक्रमण हुआ था तब अहमद शाह अब्दाली के उत्पात का वर्णन करते हुए चाचा जी ने हित मुकुंद लाल जी, हित प्रेमदास जी, हित कृष्ण दास जी भावुक, आनंदघन कवि, जादौ दास, कृष्णदास पुजारी, जुगल दास अवधूत आदि रसिक भक्तों का आक्रमण में मारे जाने का भी उल्लेख किया है। भक्तों की ऐसी स्थिति को देखकर चाचा जी का हृदय अत्यंत दुखी था। कुछ दिन बाद चाचाजी फरूखाबाद चले गए। वहां रासलीला अनुकरण का आयोजन था। चाचा जी रासलीला देखकर रात्रि में विश्राम कर रहे थे। तभी स्वप्न में आनंदघन कवि जी का ख्याल सुना और देखा कि 12 वर्ष का एक बालक ऊंचे भवन से गिर पड़ा।
चाचाजी व्याकुल हो गए की कहीं बालक मर तो नहीं गया। लेकिन वह तुरंत खड़ा होकर अपनी भुजाएं ठोकने लगा। चाचा जी के पूछने पर उसने बताया मैं तो आनंदघन के पास आया था। चाचा जी ने पूछा -आनंदघन जी कहां है? बालक ने कहा पीछे मुड़कर देखो। चाचा जी ने पीछे मुड़कर देखा की रासलीला में सभी भक्त विराजमान हैं, जो की आक्रमण में मारे गए थे। बालक बोला - अभी मैंने एक कला खेली है, और एक खेलूंगा अर्थात यवनो का आक्रमण 1813 एवं 1817 में दो बार हुआ। प्रातः काल सभी संतो से चाचा जी ने यह बात बताई और हरि इच्छा जानकर सहन किया।

प्रसंग 2: वृंदावन के लिए असहनीय पीड़ा एवं वृंदावन आगमन
कुछ समय चाचाजी कृष्णगढ़ नरेश बहादुर सिंह और उनके पुत्र विदिर सिंह के राज्य में रहे। राज महल में निवास करते हुए राजा के प्रार्थना पर कई ग्रंथों की रचना यहां हुई । लगभग 6 वर्ष यहां बहुत कठिनाई से बीते। वृंदावन का विरह प्रतिक्षण असह्य हो रहा था। चाचा जी की प्रार्थना स्वीकार कर प्रभु ने कृष्णगढ़ नरेश को स्वप्न में प्रेरणा दी कि चाचा जी को शीघ्र वृंदावन पहुंचाओ। चाचा जी को राजा ने सम्मान पूर्वक वृंदावन भेजा।

गुरु कृपा एवं रचित ग्रन्थ :
जब हृदय में प्रेम का प्रादुर्भाव होता है तब हृदय से प्रेम के प्रतिकात्मक शब्द निकलने लगते हैं। प्रेम के प्रतिकात्मक शब्दों में प्रेम के ही अनंत रूप एवं गुणों का आख्यान होता है। इस प्रेमोदगान को ही रसिकों ने ‘वाणी’ कहकर प्रकीर्तित किया है। 
एक बार गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी ने चाचा जी को प्रभु का यशगान करने की आज्ञा दी, किन्तु प्रतिभा का प्रस्फुरण न होने से पद बनाने में यह समर्थ नहीं हुए। इससे गुरु ने आज्ञा दी - "तुम यहाँ से चले जाओ।" गुरु आज्ञा से अत्यन्त दुःखी होकर आप मानसरोवर चले गए; किन्तु वहाँ पहुँचते ही प्रभु ने कृपा की और प्रतिभा जागृत हो गयी। पद-रचना का प्रवाह चल पड़ा और आपने वृन्दावन आकर गोस्वामी जी को श्रीराधावल्लभ लाल का गुणानुवाद सुनाया। 
श्री गुरु कृपालब्ध चाचा वृंदावन दास जी के कण्ठ से अब वाणी का अजस्र प्रवाह होने लगा, जो कि उनके जीवन पर्यंत श्रावणी सरिता सलिल की भांति अखंड रूप से चलता रहा। चाचा जी इतने रस सिद्ध थे कि स्वप्न में भी लीला दर्शन करते जो कि जागने पर इन्हें देखे हुए चित्रों की भाँती स्मरण रहती और यह इसे लिपिबद्ध कर लिया करते। ‘स्वप्न विलास’ नामनी रचना इसका पुष्ट प्रमाण है। 

भरतपुर नरेश सुजान सिंह जी के यहां कुछ काल निवास करते हुए ‘हरिकला बेली’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना की। भरतपुर राज्य के डीग ग्राम में निवास करते हुए चाचा जी ने ‘यमुना प्रताप बेली’ की रचना की । कोसी में निवास करते हुए ‘विवाह मंगल बेली’ और वृंदावन का वास करते हुए ‘अष्टयाम सेवा समय प्रबंध’ की रचना की।
‘श्री हित रूप चरित्र बेली’ जैसे प्रमाणित इतिहास ग्रंथ की रचना कामवन स्थित राधा बल्लभ जी के मंदिर के निकट काशीराम नामक रसिक के घर में रहकर पूर्ण की । ‘वृंदावन जस प्रकाश बेली’ ‘युगल प्रीति प्रकाश पचीसी’  कृष्ण विवाह उत्कंठा बेली, आत्र पत्रिका’ आदि अनेक रचना यवनों के आंतक काल में रचित है। आकर चाचा जी ने श्री राधा कांत मंदिर, अठखंभा, वृंदावन में निवास करते हुए यहीं 'ब्रज प्रेम आनंद सागर' ग्रंथ पूर्ण किया। भरतपुर नरेश के आग्रह पर चाचा जी कुछ समय के लिए भरतपुर पधारें और उसका आतिथ्य स्वीकार करते हुए 'प्रेम पहेरी' वाणी की रचना की। कुछ दिनों के बाद चाचाजी पुनः वृंदावन आ गए और स्थाई रूप से वृंदावन का वास करने लगे। वृंदावन का वास करते हुए चाचा जी ने कई स्थलों को अपनी साधना स्थली बनाया। 'ईष्ट पद बंदन बेली' रचना में चाचा जी ने लिखा है कि परमेषट श्यामा श्याम ने वृंदावन के कैवारी वन स्थित दावानल कुंड के किनारे पर मुझे कदंब वृक्ष लगाने की आज्ञा दी थी और मैंने इस आज्ञा का पालन भी किया।                 
वहाँ कदंब वृक्ष का आरोपण करके पद भी गाया। कदम्ब वृक्षों का दर्शन आज भी वहां होता है। चाचा जी ने ब्रज चौरासी कोस का भ्रमण भी किया। गोस्वामी कृष्ण चंद जी के सेव्य स्वरुप श्री राधा मोहन जी के मंदिर में रसिक भक्तों की प्रेरणा से सेवक भक्ति परचावली और सेवक जस विरदावली नामक दो ग्रंथों की रचना की। इस प्रकार चाचा जी का संपूर्ण जीवन श्यामा श्याम के दिव्य चिंतन और लीला गान के मध्य रहा। 
चाचा श्री हित वृन्दावनदास जी के 187 ग्रन्थ तथा और बहुत सी वाणियाँ कही जाती हैं। 

लीला संवरण :
हित संप्रदाय की मान्यता के अनुसार चाचाजी का निकुंज गमन 1774 में फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को वृंदावन के प्राण सेवा कुंज में बड़ी विचित्र रीति से हुआ। फालगुन शुक्ल द्वितीया के दिन सेवा कुंज में पूर्व परंपरा से प्रचलित समाज गायन हो रहा था। सभी रसिकों के साथ चाचा जी भी समाज गान में तल्लीन थे और वह सबके समक्ष रासलीला में तन्मय होकर निजस्वरूप का चिंतन करते हुए शरीर सहित अंतर्ध्यान हो गए। उनके स्थान पर उनका एक उत्तरीय ही प्राप्त हुआ। आश्रय में इस घटना के कारण ही श्री हित नाद बिंदु परिवार के द्वारा सेवा कुंज में उनका स्मारक स्थल निर्मित हुआ और पूर्व परंपरा से प्रचलित यह एक दिवसीय समाज गान चाचा जी के अष्ट दिवसीय समृति महोत्सव के रूप में परिवर्तित हो गया।            
उसी दिन से आज भी फाल्गुन शुक्ल द्वितीया से फाल्गुन शुक्ल दशमी तक चाचा जी का यह निकुंज प्राप्ति महोत्सव सेवा कुंज में होता चला आ रहा है। चाचा जी के निकुंज प्रवेश का स्मारक चिन्ह सेवा कुंज में आज भी विद्यमान है जिसमें उनके द्वारा रचित वाणी की संख्या एवं जीवन प्रवेश के समय का उल्लेख है।