(राग सोरठ)
मुरली कौन तप तें कियौ।
रहत गिरधर मुखहि लागी अधरन को रस पियौ॥ [1]
नंद नंदन पानि परस कै तोहि तन-मन दियौ।
सूर श्री गोपाल वस किये जगत में जश लियौ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे मुरली, तूमने कौन-सी तपस्या की है जिससे तुम सदैव गिरिधारी के अधरामृत पर विराजमान हो उसके दिव्य रस का पान करती हो। [1]
नंद नंदन ने तुम्हारे लिए अपना तन-मन सौंप दिया है। श्री सूरदास जी कहते हैं, "हे मुरली, तूने श्री गोपाल को अपने वश में कर लिया है और समस्त संसार में प्रसिद्ध हो।" [2]
मुरली कौन तप तें कियौ।
रहत गिरधर मुखहि लागी अधरन को रस पियौ॥ [1]
नंद नंदन पानि परस कै तोहि तन-मन दियौ।
सूर श्री गोपाल वस किये जगत में जश लियौ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे मुरली, तूमने कौन-सी तपस्या की है जिससे तुम सदैव गिरिधारी के अधरामृत पर विराजमान हो उसके दिव्य रस का पान करती हो। [1]
नंद नंदन ने तुम्हारे लिए अपना तन-मन सौंप दिया है। श्री सूरदास जी कहते हैं, "हे मुरली, तूने श्री गोपाल को अपने वश में कर लिया है और समस्त संसार में प्रसिद्ध हो।" [2]

