आलसी हौं क्रूर हौं कपूत भांति भांतिन को - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (93)

आलसी हौं क्रूर हौं कपूत भांति भांतिन को - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (93)

आलसी हौं क्रूर हौं कपूत भांति भांतिन को,
और न उपाय मेरे ध्वाई मोहि कान्ह की। [1]
करुना करोई हिये आपनौई जान ‘हठी’,
तें तौ प्रानप्यारी सदा करुनानिधान की॥ [2]
दीनन की पाल लोकपाल दयासिंधु तोकौं,
ध्यावत गुपाल जिन दावानल पान की। [3]
सोसै नहीं मन मेरो दोसै नहीं काम राखे,
तेरेई भरोसै यह बेटी वृषभान की॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (93)

श्री हठी जी कहते हैं "मैं आलसी हूँ, क्रूर हूँ, अनेक भाँति कपूत हूँ, लेकिन श्री कृष्ण की कृपा के अतिरिक्त मेरे पापों का कोई निवारण नहीं है।" [1]

हे करुणानिधान प्राणप्यारी श्री राधे, मुझे हृदय से अपना जान मुझ पर करुणा कीजिये। [2]

हे श्री राधे, आप दीन जनों की पालक एवं लोकपाल हैं, हे दयासिन्धु, दावानल पान करने वाले श्री कृष्ण भी आपकी आराधना एवं ध्यान करते हैं। [3]

हे वृषभानु नंदिनी, न मुझे सुख की आकांक्षा है न दुःख से कोई प्रयोजन, मेरा तो एकमात्र सहारा आप ही हैं। [4]