जन्म :
किशनगढ़ के महाराजा राज सिंह जी के बड़े पुत्र सावंत सिंह जी का जन्म पौष सुदी द्वादशी, वि.सं. 1756 (1699 ई.) को हुआ।
जीवन परिचय :
बाल्यकाल - बचपन के वीरतापूर्ण कृत्य (हाथी और सर्प से युद्ध)
शौर्य, भक्ति कला का संगम माने जाते हैं महाराजा सावंतसिंह (नागरीदास) जी।
वि.स. 1766 (1709 ई.) के एक दिन दिल्ली में बादशाह के एक बिगड़ैल हाथी को 10 वर्षीय बालक सावंत सिंह ने अपनी तलवार से ऐसा वार किया कि हाथी चिंघाड़ता हुआ पलट कर भाग खड़ा हुआ।
वि.स. 1771 में यही बालक दिल्ली दरबार की सभा में बैठा अपने पायजामे में घुसे विषधर सांप को वहीँ मसल कर बिना किसी को बताये सभा से बाहर फैंक दिया।
राजकुमार सावंतसिंह ने 13 वर्ष की अल्पायु में ही अकेले बूंदी के हाड़ा जैतसिंह को मार डाला था।
वैष्णवी दीक्षा :
उस समय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ (सलेमाबाद) के सिंहासन पर श्री वृन्दावन देवाचार्य जी महाराज विराजमान थे। राजसिंहजी ने आपसे ही अपने राजकुमार को दीक्षा (मन्त्रोपदेश) और शिक्षा भी दिलाई।
(सिंह से गायों की रक्षा )
वि.स. 1789 (1732 ई.) में राजस्थान की आचार्यपीठ सलेमाबाद के नवनीतपुरा गांव के गोचर में एक सिंह आ गया। उस गोचर में आचार्यपीठ की गायें चरा करती थी साथ ही वहां से लकड़ियाँ एकत्र की जाती थी। राजकुमार सावंतसिंह गौ-रक्षा हेतु उस खूंखार सिंह से भिड़ गए और उसे पछाड़ कर मार डाला।
वैवाहिक जीवन :
1777 वि० में ज्येष्ठ शु० 9 को भानगढ़ नरेश यशवन्तसिंहजी की राज-कन्या का विवाह श्री सावंत सिंह जी से हुआ। 1783 वि० में आपके प्रथम सन्तान हुई फिर 1787 में राज कुमार सरदारसिंहजी का जन्म हुआ ।
राज सिंहासन पर राज्याभिषेक एवं मराठा सरदारों को बिना चौथ दिए लौटाना:
पिता के निधन के बाद बैसाख सुदी चतुर्थी, वि.सं. 1805 को पिता राजसिंह जी के द्वादशे के दिन दिल्ली में ही आपका राज्याभिषेक हुआ और आप किशनगढ़ व रूपनगर राज्य के विधिवत शासक बन गद्दी पर बैठे। उस काल में मराठा सरदार राजस्थान में उपद्रव मचाकर राजाओं से चौथ वसूलते थे किन्तु इन्होंने कोई चौथ नहीं दी और रूपनगर से मराठा सरदार को खाली हाथ लौटाया।
(गृह कलह)
आपकी अनुपस्थिति में आपके भाई बहादुरसिंह द्वारा जोधपुर के महाराजा की सहायता से राज्य पर कब्ज़ा कर लेने से गृह युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। इससे महाराजा सावंतसिंह के मन में विरक्ति के भाव पैदा हो गए और वे सब कुछ छोड़कर वृंदावन चले आये।
वृन्दावन आगमन एवं अनुराग :
वि० 1780 में आपने एक 'मनोरथ-मञ्जरी' ग्रन्थ की रचना की। उस समय यद्यपि आप तरुण थे, किन्तु सांसारिक सुखों में उलझना नहीं चाहते थे। श्रीवृन्दावन के लिये ही आपका मन छटपटाता रहता था। उनकी यही लालसा रहती थी - 'कब वृन्दावन पहुँच कर वहाँ की रज में लोटूँ और उसे मुख में डाल कर अन्तःकरण तक पहुँचाऊँ।
कब वृन्दावन धरन में, चरन परैंगे जाय।
लोटि धूरिधरि शीश पर, कछु मुखहू मैं पाय॥
वे वृन्दावन में जमुनातट पर लता-पताओं में एकाकी रहकर प्रियाजी सहित श्रीश्यामसुन्दर को अपनी ओर आते हुए देखना चाहते थे -
कबै झुकत मो ओर कौं, अैहैं मद गज चाल।
गरबाँही दीने दोऊ, प्रियानवल नन्द लाल॥
ऐसे मनोरथ करते हुए बीसों वर्ष बीत गये। राजकाज, कुल-कानि और परिवार प्रबन्ध में; किन्तु वे मन ही मन पश्चात्ताप करते थे - 'धिक्कार है ! इस मानव-देह को ! जो सब साधनों से सम्पन्न होते हुए भी वृन्दावन नहीं पहुँच पाती। ऐसी मानव-देह से तो वे बन्दर, कुत्ते, कौए, पशु-पक्षी आदि तुच्छ जीव-जन्तु भी अच्छे हैं जो श्रीवृन्दावन में रह रहे हैं -
धन धन वृन्दावन के जन्त।
छोटे मोटे कहाँ लगि बरणों, जिनकी जाति अनन्त॥
जिस समय नागरीदासजी वृन्दावन पहुँचे, उन्हें अपनी बीती हुई आयु पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ - हा ! मैंने वृन्दावन से दूर रहकर कितने दिन व्यर्थ खो दिये -
किते दिन बिन वृन्दावन खोये।
यौं ही वृथा गये ते अब लौं, राजस रंग समोये॥
छाँड़ि पुलिन फूलन की सज्जा, सूल सरनि पर सोये।
भीजे रसिकअनन्य न दरसे, विमुखनि के मुख जोये॥
हरि विहार की ठौर रहे नंहि, माया रांड बिगोये॥
इक रस ह्याँके सुख तजि कैं, ह्वाँ कभू हँसे कभु रोये।
कियो न अपनौ काज पराये, शीश भार पर ढोये॥
पायो नहीं आनन्द लेस मैं, सवै देश टक- टोये।
'नागरीदास' बसे कुंजनि मैं, जब सब बिधि सुख भोये॥
श्रीवृन्दावन के दर्शन कर उन्हें धैर्य ही नहीं बँधा अपितु विश्वास हो गया कि अब मुझे मानव-देह-धारण का सच्चा फल मिल गया।
देह धरैं कौ अब फल पायो।
बीते बहुत बरस असमंजस, माया नाच नचायो॥
फिर तो उन्होंने यही निश्चय कर लिया कि अब वृन्दावन को छोड़ कर वापिस नहीं जाऊँगा; घर पर ही नहीं बल्कि और अन्य तीर्थों में भी जाने की अब आवश्यकता नहीं। उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि अब श्यामसुन्दर अवश्य मुझे अपनायेंगे।
अब तो यही बात मन मानी।
छाँड़ौं नहीं श्याम श्यामा की, वृन्दावन रजधानी॥
हरि भक्तनि मैं रक्तति ह्वै हीं, निन्दा मुख अभिमानी।
नागरिया नागर कर गहिहैं, रहिहैं जक्त कहानी॥
अब तक जो बिगाड़ हुआ था, वृन्दावन पहुँचने पर उसका भी सुधार हो गया। आगे भी अब उन्हें किसी क्षति की आशंका नहीं रही; कारण श्रीवृन्दावन ठौर तो समस्त विश्व से निराला है। यहाँ पर कलह-क्लेश व्यापता ही नहीं -
हमारी सब ही बात सुधारी।
कृपा करी श्रीकुंजविहारिन अरु श्रीकुंजविहारी॥
विश्व में बणी-ठणी (बनी ठनी जी) के नाम व राजस्थान की मोनालिसा के नाम से मशहूर जो श्री नागरी दास जी की सेवा करती थी, वह भी नागरीदास के वृंदावन वास लेते ही उनके पीछे पीछे वृंदावन आगाई। इनकी समाधि भी वृंदावन में ही है । इनके भी कुछ पद प्राप्त होते हैं जो “रसिक बिहारी" की छाप से हैं ।
वृन्दावन में जब लोगो ने सुना कि किशनगढ़ महाराजा सांवत सिंह जी आये हैं तो कोई मिलने नही आया किन्तु जब मालूम पड़ा की नागरीदास आये हैं तो लोग बांध भरकर मिले :
सुनी व्यवहारिक नाम को, ठाडे दूर उदास !
दौड़ मिले भरी भुजन सुनी , नाम नागरीदास !!
वृन्दावन में इनके हाथ खर्च ,दान पुण्य आदि के लिए नियमित राशी आती थी किन्तु एक बार उसमे कुछ विलम्ब हो गया तो इन्होने अपने पुत्र को यह दोहा लिख भेजा :
दांत गिरे और खुर घिसे , पीठ बोझ नही लेत !
ऐसे बूढ़े बैल को , कौन बांध खल देत !!
ग्रंथ रचना :
नागरीदासजी नाम के चार भक्त-कवि हो गये उनमें यह चौथे नागरीदास ही कृष्णगढ़-नरेश हैं। इन्होंने कई ग्रन्थोंका संकलन किया है, उनमें स्पष्ट अन्य कवियों के पदों के अतिरिक्त जिन-जिन ग्रन्थों के निर्माण का समय इन्होंने लिखा है, वे तो निर्विवाद इनके ही हैं। अवशिष्ट ग्रंथ विचारणीय हैं। नागर समुच्चय में सभी को मिलाकर 75 संख्या दी गई।
कई काव्य रचनाएँ लिखकर हिंदी काव्य क्षेत्र में आप नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिनमें 73 पुस्तकें कृष्णगढ़ (किशनगढ़) में संग्रहीत हैं। आपकी भावुकता और श्रृंगारप्रियता ने कविता के रूप में कृष्ण भक्ति की जो रस धारा प्रवाहित की उसे किशनगढ़ के चित्रकारों ने जिस अंदाज व खूबसुरत शैली के साथ कूंचीबद्ध किया आज वह शैली विश्व की अन्य चित्र शैलियों की सरताज है।
लीला संवरण :
आपका चरित्र मनन करने योग्य है। अन्तिम दिनों में विरक्त बनकर आप निश्चल रूप से वृन्दावन में रहे और यहाँ पर ही ब्रज- रज प्राप्त की। वृन्दावन के रसिक भक्तों में विशेष प्रतिष्ठा के साथ आपका नामोल्लेख किया जाता है। जिस स्थल पर वृन्दावन में आप रहे थे, श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय का वह स्थल नागरीदासजी का घेरा, क्षेत्र और नागरिकुंज आदि नामों से विख्यात हैं।

