श्रीगोपेन्द्र-कुमार-मोहन-महाविद्ये स्फुरन्माधुरि, सारस्फार रसाम्बुराशि सहज प्रस्यन्दि-नेत्राञ्चले।
कारुण्यार्द्र कटाक्ष- भङ्गि मधुरस्मेराननांभोरुहे, हा हा स्वामिनि राधिके मयिकृपा-दृष्टिं मनाङ् निक्षिप॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (188)
जो नन्दनन्दन को मोहित करने वाली महा विद्या रूपा हैं, जिनके नेत्रों की कोरों से उमड़ती हुई महा माधुरी के सार का उछलता हुआ रस-समुद्र सहज रूप से प्रवाहित होता रहता है, जिनकी कटाक्ष-भंगिमायें करुणा से भींगी हुई हैं, जिनका मुख कमल मधुर-मधुर मुस्कुराता रहता है (ऐसी) हे स्वामिनी राधिके ! मुझ पर थोड़ी-सी कृपा दृष्टि कीजिए।
कारुण्यार्द्र कटाक्ष- भङ्गि मधुरस्मेराननांभोरुहे, हा हा स्वामिनि राधिके मयिकृपा-दृष्टिं मनाङ् निक्षिप॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (188)
जो नन्दनन्दन को मोहित करने वाली महा विद्या रूपा हैं, जिनके नेत्रों की कोरों से उमड़ती हुई महा माधुरी के सार का उछलता हुआ रस-समुद्र सहज रूप से प्रवाहित होता रहता है, जिनकी कटाक्ष-भंगिमायें करुणा से भींगी हुई हैं, जिनका मुख कमल मधुर-मधुर मुस्कुराता रहता है (ऐसी) हे स्वामिनी राधिके ! मुझ पर थोड़ी-सी कृपा दृष्टि कीजिए।

