प्रान धन वृन्दावन ताकौं न विसार मन - श्री प्रेमदास जी

प्रान धन वृन्दावन ताकौं न विसार मन - श्री प्रेमदास जी

प्रान धन वृन्दावन ताकौं न विसार मन,
निरख लतान छबि उमड़ी परत हैं। [1]
नैंन भर ढारैं हेर हेर मतवारे संत,
कदली कदम्ब अंब मन को हरत हैं॥ [2]
झुके हैं तमाल-वट रज कौं नबत माथ,
दम्पति विलोक मनभाई-सी करत हैं। [3]
सेवा की निकुंजन में चरन पलोटै प्यारौ,
प्यारीजू की "प्रेमसखी" बीजना ढोरत हैं॥ [4]

- श्री प्रेमदास जी

श्री प्रेमदास जी कहते हैं, "हे मन, अपने प्राणों के धन श्री वृंदावन को कभी न भूलना। यहाँ की लताओं की अद्भुत सुंदरता देखो, कैसे छवि बिखेरकर अपनी शोभा लुटा रही हैं।" [1]

इन्हीं वृक्षों और लताओं की ओट में रसिक संतों ने अपने आंसुओं से प्रियालाल को लाड़ लड़ाया है। इसी वन में हर्षित करने वाले कदली, कदम्ब और आम के वृक्षों का दर्शन मन को आनंदित कर देता है। [2]

यहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य विहार करते हैं, और तमाल एवं वट वृक्ष भी अपनी शाखाओं को झुकाकर दिव्य रज रानी को प्रणाम करते हैं। [3]

श्री प्रेमदास जी सखी भाव में कहते हैं "सेवा कुञ्ज में प्यारे श्री श्यामसुंदर श्री प्यारी जू की चरण सेवा कर रहे हैं एवं मैं, श्री प्यारी ज़ू की सखी, उन्हें शीतलता प्रदान करने हेतु चंवर डुला रही हूँ।" [4]