कोटि भजन एकादसी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237)

कोटि भजन एकादसी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237)

कोटि भजन एकादसी, कोटि तीर्थ अस्नान।
दुखवै काहू संत कौं, (तौ) हरि नहिं करैं प्रमान॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237)

चाहे कोई करोड़ों बार एकादशी का व्रत और भजन कर ले, या करोड़ों तीर्थों में स्नान कर ले, परंतु यदि वह किसी संत (भक्त) का दिल दुखाता है, तो श्री हरि उसकी भक्ति को कभी स्वीकार नहीं करते।