वंश परंपरा :
श्री नाभा दास जी ने भक्तमाल ग्रंथ में श्रीमद्भागवत के महा पंडित श्री नारायण मिश्र जी का एक छप्पय में चरित्र गान किया है। यह नवला वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। श्रीमद्भागवत के मनन चिंतन से सहज ही ब्रज धाम के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया और ब्रज वास की इच्छा से मथुरा पधारें। शेष जीवन मथुरा वास करते हुए इन्हें यहीं ब्रज रज की प्राप्ति हुई। इन्हीं के वंशज श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी श्री धाम वृंदावन में श्रृंगार वट के निकट ललित कुंज में अपने ठाकुर श्री किशोरी रमन जी की सेवा में रहते थे। यह परम विद्वान एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। इनके सैंकड़ों शिष्य सेवक थे।
जन्म :
श्री प्रद्युम्न गोस्वामी के सेवकों ने दिल्ली में बड़ा मंदिर के नाम से एक प्रसिद्ध मंदिर बनवाया जो आज भी अवस्थित है। इन्ही के पुत्र के रुप में 1707 ई को अश्विन शुक्ला प्रतिपदा को श्रीमती कृष्णावती जी के गर्भ से श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी के सुपुत्र ललित संप्रदाय के प्रवर्तक श्री वंशी अली जी प्रगट हुए। माता पिता ने इनका नाम वंशीधर रखा। आगे यही आचार्य के रूप में वंशी अली के नाम से प्रसिद्ध हुए।
जन्म से ही श्री राधा नाम में अनुराग एवं एक विचित्र लीला :
जन्म के पश्चात बालक वंशीधर ने माताजी के बहुत प्रयास करने के बाद भी स्तनपान नहीं किया, सभी परिवार के लोग चिंतित हो गए। सब विचार करने लगे की यदि बालक दूध नहीं पिएगा तो जीवित कैसे रहेगा। उसी समय एक ब्रजवासी बरसाने से आया और बालक के पास आकर राधा राधा रटते हुए बालक को खिलाने लगा। राधा नाम सुनते ही बालक ने स्तनपान करना आरंभ कर दिया। सभी परिवार के लोग प्रसन्न हुए और बृजवासी को भेंट प्रदान की।
अति अद्भुत राधा प्रेम की अभिव्यक्ति :
अब वंशीधर जी की आयु धीरे- धीरे बढ़ने लगी। 5 वर्ष की अवस्था में उनके आसाधारण राधा प्रेम की अभिव्यक्ति खेल के माध्यम से प्रकट होने लगी। खेल में यह राधा राधा नाम का कीर्तन करते और राधा संबंधी भजन गाया करते। उनको सभी बहुत स्नेह करते। वंशीधर जी नित्य ही यमुना स्नान को जाते और लौटकर भागवत की कथा करते।
बाल्यकाल : (पाञ्चजन्य शंख की नित्य स्थिति का रहस्योद्घाटन)
जन्म से ही श्रीवंशी अली जी दिव्य प्रतिभा संपन्न थे। इन्होंने बाल्य अवस्था में ही सम्पूर्ण वेद-शास्त्र व अनेकों संस्कृत ग्रन्थों को हृदयङ्गम कर लिया था, तर्कशास्त्र के अद्वितीय विद्वान थे, श्रीमद्भागवत के गूढ़ श्लोकों का इस प्रकार व्याख्यान करते की बड़े-बड़े प्रकाण्ड पण्डित भी आश्चर्य चकित हो जाते। एक समय जयपुर के तत्कालीन शासक महाराज सवाई जयसिंह को गोस्वामी श्री प्रद्युम्न जी के दर्शन की इच्छा जागृत हुई। महाराज ने बड़ी विनम्रतापूर्वक उन्हें अपने दरबार में बुलाया। दस वर्षीय वंशी अली जी भी पिता के साथ आ गए। एक दिन श्री राधा गोविन्द देव जी के मन्दिर प्रांगण में महाराज जयसिंह श्रीमद्भागवत कथा सुन रहे थे। कथा के पश्चात राजा ने सभी विद्वानों से अपनी एक शंका का समाधान करने को कहा -
"गुरु सान्दिपनी जी से भगवान् श्रीकृष्ण विद्या ग्रहण करने के पश्चात् गुरु-दक्षिणा के रूप में गुरु-पुत्र लेने गये और पाञ्चजन्य (शंखासुर) का वध करके भगवान् ने शंख धारण किया किन्तु देवकी-वसुदेव को तो जन्म के पूर्व ही चतुर्भुज रूप का दर्शन करा दिया था, जो शंखादि आयुधों से सुशोभित था, तो वहाँ शंख कहाँ से आया ?"
महाराज जयसिंह के इस प्रश्न पर समस्त विद्वत्-समाज मौन था, तब अपने दस वर्षीय बालक की ओर देखते हुए पिता श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी ने उन्हें उत्तर देने के लिए कहा। बालक वंशीधर ने कहा –
"राजन् ! भगवान् के समस्त आयुध उनके ‘पार्षद’ हैं जो चिन्मय तथा नित्य हैं। पाञ्चजन्य शाप के कारण असुर हुआ एवं उसे मुक्त करने के लिए प्रभु ने उसका वध किया और वह मुक्त होकर अंश रूप से पुनः अपने नित्य पार्षद रूप में मिल गया, जैसे – सनकादिक मुनीश्वरों ने भगवान के पार्षद जय-विजय को शाप दिया था, जो तीन जन्मों के बाद पुनः मुक्त होकर अपने नित्य पार्षद रूप में जाकर मिल गए; इसी प्रकार पाञ्चजन्य भी शाप वश अपने अंश रूप से असुर बना और प्रभु के द्वारा मोक्ष प्राप्त करके पुनः नित्य पार्षद रूप को प्राप्त हो गया।"
दस वर्षीय बालक वंशीधर के मुख से शास्त्र-सम्मत व सन्तोषजनक इस उत्तर को पाकर महाराज के आश्चर्य की सीमा नहीं रही, हाथ जोड़ कर पिता श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी से महाराज ने कहा –
"यह बालक साधारण नहीं है, यह तो कोई अवतारी पुरुष प्रतीत होता है।"
इसके उपरान्त महाराज ने सम्मानपूर्वक श्री प्रद्युम्न गोस्वामी को अपार सम्पत्ति सहित जागीर भेंट की।
वैवाहिक जीवन :
बालक वंशीधर का विवाह 15 वर्ष की अवस्था में संपन्न हुआ। जब वे बीस वर्ष के हुए तो उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुयी जिसका नाम पुण्डरीकाक्ष रखा गया।
आध्यात्मिक जीवन :
राधाष्टमी पर बधाई गीत से भावावेश एवं वृन्दावन आगमन :
जब श्री वंशी अली 28 वर्ष के हुए तो पिता जी का धाम गमन हो गया। पिताजी के धाम गमन के एक वर्ष पश्चात राधा प्रेम में सहसा बाढ़ सी आ गई। जब राधा कुंड के एक पंडित राधाकृष्ण ने दिल्ली के मंदिर में राधा अष्टमी के उत्सव में बधाई गाई -
“रस बरसे री हेली कीरत महल में।”
उस समय श्री वंशी अली ऐसे प्रेम मगन हुए की प्रेमाश्रुओं की झड़ी लग गई। डेढ़ घंटे तक मूर्छित होकर भूमि पर पड़े रहे। चेतना आने पर हृदय में इतना प्रेम उल्लास भर गया कि उस वर्ष राधाष्टमी के उत्सव में तीन हजार रुपए खर्च कर बहुत धूमधाम से उत्सव मनाया। दूसरे वर्ष भी राधाष्टमी के उत्सव में दो हजार रूपए खर्च किए। माताजी अधिक धन खर्च करने से नाराज होकर बोली - भविष्य में इतना खर्च नहीं करना। वंशीधर को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने कहा
"धन किस लिए है ? ठाकुर जी की सेवा के लिए ही न।"
वंशीधर जी रुष्ट हो कर अकेले वृंदावन आ गए। कुछ दिन बाद ही नादिरशाह का दिल्ली में लूट और कत्लेआम का दौर चला। उसी में मंदिर का सारा धन चले गया जिसे माता ने राधा अष्टमी के उत्सव में खर्च करने को मना किया था। वृंदावन में रास मंडल के पास ललित कुंज में वंशीधर जी तन्मयता पूर्वक भजन करने लगे।
श्री ललिता सखी से मन्त्र दीक्षा प्राप्त करना :
ललित कुञ्ज में श्रीराधारानी की आज्ञा से महासखी श्री ललिता जी ने श्री वंशीधर जी को मन्त्र-दीक्षा प्रदान किया जिसका उन्होंने स्वयं उल्लेख किया है –
गुरुः श्री ललिता ज्ञेया सा तु तस्याः परासखी।
तत्त्व स्वरूपा च भक्तास्या राधातोप्याधिका मम॥
"श्री वंशी अली जी की गुरु उनकी ज्ञेय श्रीराधारानी की परा सखी श्रीललिता जी हैं। शिष्य वंशी अली के लिये गुरु श्री ललिता जी तत्व स्वरूपा एवं रसिकों की प्रिय श्रीराधारानी से भी अधिक मान्य हैं।"
श्री वंशी अली जी की इस मान्यता का भाव श्री कबीर दास जी के इस दोहे से स्पष्ट है -
“गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय॥”
मन्त्र दीक्षा उपरांत श्री ललिता जी ने वंशीधर को बरसाने जाकर भजन करने की आज्ञा दी। साथ ही साथ यह आशीर्वाद भी दिया कि बरसाने में श्रीजी के दर्शन होंगे।
बरसाना में श्री राधारानी के दर्शन :
वंशीधर जी बरसाने आ गए। अब सभी लोग वंशी अली के नाम से पुकारने लगे। बरसाने में रंगीली गली में कूड़ा फेंकने के स्थान पर अपना आसन जमा कर भजन करने लगे।
एक मईया बोली - अरे बाबा ! “तोयै घूरे पै ही भजन करिबै की ठौर मिली का?”
वंशी अली जी बोले "मैया आप सखियों की चरण रज मुझे यहीं सुविधा पूर्वक प्राप्त होगी। जब आप कूड़ा फेंकोगी तो बरसाना के भक्तों की चरण रज उड़कर मेरे मस्तक पर लगेगी। इस लोभ से मैंने अपना आसन यहाँ लगाया है।"
वंशीअलि जी ने 12 वर्ष तक कूड़े पर पड़े रहकर भजन किया। श्रीजी ने कृपा करके दर्शन दिया।
बरसाना में सखी स्वरुप की प्राप्ति :
एक दिन वंशी अली जी ऊपर श्रीजी मंदिर में दर्शन करने गये। श्री चिंतामणि गोस्वामी जी श्रीजी की सेवा में थे। श्रीजी जगमोहन में विराज रही थीं। वंशी अली जी अपने धुन में जगमोहन में ऊपर चढ़ने लगे। गोस्वामी जी बार बार मना कर रहे हैं। लेकिन इन्होंने कुछ सुना ही नहीं। विवश होकर गोस्वामी जी ने अपनी खड़ाऊ खींचकर मारी। उस समय गोस्वामी जी आश्चर्यचकित रह गए यह देखकर कि एक स्वरूप से वंशी अली जी गोस्वामी जी से बात कर रहे हैं और दूसरे स्वरूप से श्रीजी की सेवा कर रहे हैं। गोस्वामी जी को बहुत पश्चाताप हुआ और वंशी अली जी से क्षमा भी मांगी। वशी अली जी बोले – आपकी कृपा से श्रीजी ने मुझे अपना परिकर बना लिया, आज से आप हमारे तीर्थ गुरु हुए। तभी से आज तक चिंतामणि जी के वंशजों को वंशी अली के वंशज अपना तीर्थ गुरु मानते आ रहे हैं।
परी रहौं वृषभानु के द्वारैं, जहाँ मेरी लाड़िली राधा।
खेलत आवै सुख उपजावै, प्राणन की ये साधा॥
कीरति कुल उजियारी प्यारी, हिय की चैन अगाधा।
ठौर नहीं ‘वंशीअलि’ हिय में, और लगै सब बाधा॥
नवीन संप्रदाय स्थापना (ललित सम्प्रदाय) :
श्री ललिता जी से मन्त्र दीक्षा प्राप्त कर श्री वंशी अली ने ‘ललित सम्प्रदाय’ का प्रवर्तन किया। सम्प्रदाय के आद्याचार्य के रूप में श्री ललिता सखी को सर्वाधिक महत्त्व देते हुए कहते हैं –
“इस निकुञ्ज रस में न विष्णु का प्रवेश है, न ही किसी अन्य देव का; यहाँ तो केवल ललिता जी की कृपा से ही प्रवेश प्राप्त किया जा सकता है। कहाँ तक कहें स्वयं श्री नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण भी ललिता जू की कृपा के बिना इस दुर्लभ रस को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। “
भगवान जगन्नाथ द्वारा श्री वंशी अली जी को श्री प्रिया जी की वंशी के रूप में सत्कार करवाना :
ललित संप्रदाय के मान्यता के अनुसार वंशी अली जी श्री राधा जी के वंशी के अवतार थे। ऐसा सुना गया है कि एक बार वंशी अली जी जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। उस समय जब वंशी अली जी जगन्नाथ जी के दर्शन करने मंदिर पधारें तो पंडो को स्वप्न देकर भगवान जगन्नाथ ने वंशी अली जी को श्री प्रिया जी की वंशी के रूप में सत्कार करवाया था।
ग्रन्थ रचना :
श्री वंशी अली जी की नित्य-विहार की उपासना अपने आप में विलक्षण है, जिसका ‘वृषभानुपुर शतकम’ नामक ग्रन्थ में विलक्षण दर्शन प्राप्त होता है, जो श्रीराधारानी की कृपा से ही अवगम्य है। ‘वृषभानुपुर शतकम’ के अतिरिक्त राधा स्तोत्र, ललिता मंगल एवं अष्टपदी आदि अनेक श्री वंशी अली जी की प्रमुख रचनाएँ हैं।
ललित कुंज में वास करते हुए बहुत से ग्रंथों की रचना की। संस्कृत में ‘राधा तत्व प्रकाश’ और राधा सिद्धांत नाम के दो ग्रंथों की रचना की। राधा पंचाध्याई मोक्षवाद, शक्ति स्वातंत्र परामर्श, राधा उपनिषद की संस्कृति टीका की। ब्रज भाषा में हृदय सर्वस्व श्री राधिका महारास, श्री लाडली जु की बधाई आदि अनेक ग्रंथों की रचना की।
शिष्य परंपरा :
वंशी अली जी के बहुत से शिष्य हुए। जिनमें किशोरी अली जी एवं अलबेली अली जी अधिक प्रसिद्ध है। किशोरी अली जी का पूर्व नाम जगन्नाथ भट्ट एवं मथुरा निवासी थे। पत्नी में बहुत आसक्त थे। अचानक पत्नी का धाम गमन हो गया जिनका नाम किशोरी था। अब तो अधिक दुख होने के कारण उन्माद की दशा में हा किशोरी ! हो किशोरी ! पुकारते पुकारते बरसाना आ गए। करुणा पुकार किशोरी जी के कान में पड़ी। श्रीजी बोली – इतने आतर स्वर में हमें कौन पुकार रहा है? ललिता जी बोली – वह आपको नहीं अपनी पत्नी को पुकार रहा है। परम भोली एवं करुणा में श्रीजी बोली - बरसाने में मैं ही एक किशोरी हूँ, उसे ले आओ। ललिता जी उनको ले आई। श्रीजी के इस प्रकार अनायास दर्शन करके परम कृतार्थ हुए। ललिता जी ने तब वंशी अली जी से दीक्षा लेकर भजन करने का आदेश दिया। दीक्षा के बाद नाम हुआ किशोरी अली। ये जयपुर महाराज के गुरु भी हुए हैं।
इनके अतिरिक्त, रतन अली व रामावत अली आदि शिष्य हुए हैं।
वंशीअली जी का वैराग्य :
वंशीअली जी वृंदावन का वास करते हुए परम वैराग्यमय एवं निरंतर लीलाओं के चिंतन में जीवन यापन करते। बहुत से धनवान सेवक के होते हुए भी अपने पास तुम्बी और अंगोछे के सिवा और कुछ भी नहीं रखते। लेकिन राधा अष्टमी का उत्सव जब आता तो बीस पचीस हजार रुपए खर्च करके बहुत धूमधाम से उत्सव मनाते। श्रीमद् भागवत की कथा कहते-कहते भाव विह्वल हो जाते। भागवत जी के श्लोकों का अनेक बार अनेक प्रकार से अलौकिक नविन अर्थ करते।
लीला संवरण :
वृन्दावन स्थित ललित कुंज में ही श्री किशोरी जी का नाम रटते हुए वंशी अली जी 1765 ई में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को नित्य निकुंज में अपनी दिव्य सखी स्वरुप में अवस्थित हो गए। यहीं ललित निकुंज में उनकी समाधि विराजमान है। वंशी अली जी के सिद्धांत पर राधा बल्लभ संप्रदाय एवं श्री हरिदासी संप्रदाय का विशेष प्रभाव है। इनके नित्य बिहार का स्वरूप वैसा ही है जैसा इन संप्रदायों का है। जैसे राधा बल्लभ संप्रदाय में राधा सेव्य हैं श्रीकृष्ण सेवक हैं।श्री राधा जी ही इष्ट हैं, ऐसा ही मत इनका भी है।श्री ललिता जी का स्थान हरिदास संप्रदाय के अनुरूप गुरु के स्थान पर है। कृष्ण तत्व को राधा जी की प्राप्ति के लिए ललिता जी की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। इस संप्रदाय का पीठ स्थान जयपुर में लाडली जी का मंदिर है। ललित कुंज में सम्प्रति गादी पर महन्त आचार्य डा. श्री संजय गोस्वामी जी विराजमान हैं।
श्री नाभा दास जी ने भक्तमाल ग्रंथ में श्रीमद्भागवत के महा पंडित श्री नारायण मिश्र जी का एक छप्पय में चरित्र गान किया है। यह नवला वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। श्रीमद्भागवत के मनन चिंतन से सहज ही ब्रज धाम के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया और ब्रज वास की इच्छा से मथुरा पधारें। शेष जीवन मथुरा वास करते हुए इन्हें यहीं ब्रज रज की प्राप्ति हुई। इन्हीं के वंशज श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी श्री धाम वृंदावन में श्रृंगार वट के निकट ललित कुंज में अपने ठाकुर श्री किशोरी रमन जी की सेवा में रहते थे। यह परम विद्वान एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। इनके सैंकड़ों शिष्य सेवक थे।
जन्म :
श्री प्रद्युम्न गोस्वामी के सेवकों ने दिल्ली में बड़ा मंदिर के नाम से एक प्रसिद्ध मंदिर बनवाया जो आज भी अवस्थित है। इन्ही के पुत्र के रुप में 1707 ई को अश्विन शुक्ला प्रतिपदा को श्रीमती कृष्णावती जी के गर्भ से श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी के सुपुत्र ललित संप्रदाय के प्रवर्तक श्री वंशी अली जी प्रगट हुए। माता पिता ने इनका नाम वंशीधर रखा। आगे यही आचार्य के रूप में वंशी अली के नाम से प्रसिद्ध हुए।
जन्म से ही श्री राधा नाम में अनुराग एवं एक विचित्र लीला :
जन्म के पश्चात बालक वंशीधर ने माताजी के बहुत प्रयास करने के बाद भी स्तनपान नहीं किया, सभी परिवार के लोग चिंतित हो गए। सब विचार करने लगे की यदि बालक दूध नहीं पिएगा तो जीवित कैसे रहेगा। उसी समय एक ब्रजवासी बरसाने से आया और बालक के पास आकर राधा राधा रटते हुए बालक को खिलाने लगा। राधा नाम सुनते ही बालक ने स्तनपान करना आरंभ कर दिया। सभी परिवार के लोग प्रसन्न हुए और बृजवासी को भेंट प्रदान की।
अति अद्भुत राधा प्रेम की अभिव्यक्ति :
अब वंशीधर जी की आयु धीरे- धीरे बढ़ने लगी। 5 वर्ष की अवस्था में उनके आसाधारण राधा प्रेम की अभिव्यक्ति खेल के माध्यम से प्रकट होने लगी। खेल में यह राधा राधा नाम का कीर्तन करते और राधा संबंधी भजन गाया करते। उनको सभी बहुत स्नेह करते। वंशीधर जी नित्य ही यमुना स्नान को जाते और लौटकर भागवत की कथा करते।
बाल्यकाल : (पाञ्चजन्य शंख की नित्य स्थिति का रहस्योद्घाटन)
जन्म से ही श्रीवंशी अली जी दिव्य प्रतिभा संपन्न थे। इन्होंने बाल्य अवस्था में ही सम्पूर्ण वेद-शास्त्र व अनेकों संस्कृत ग्रन्थों को हृदयङ्गम कर लिया था, तर्कशास्त्र के अद्वितीय विद्वान थे, श्रीमद्भागवत के गूढ़ श्लोकों का इस प्रकार व्याख्यान करते की बड़े-बड़े प्रकाण्ड पण्डित भी आश्चर्य चकित हो जाते। एक समय जयपुर के तत्कालीन शासक महाराज सवाई जयसिंह को गोस्वामी श्री प्रद्युम्न जी के दर्शन की इच्छा जागृत हुई। महाराज ने बड़ी विनम्रतापूर्वक उन्हें अपने दरबार में बुलाया। दस वर्षीय वंशी अली जी भी पिता के साथ आ गए। एक दिन श्री राधा गोविन्द देव जी के मन्दिर प्रांगण में महाराज जयसिंह श्रीमद्भागवत कथा सुन रहे थे। कथा के पश्चात राजा ने सभी विद्वानों से अपनी एक शंका का समाधान करने को कहा -
"गुरु सान्दिपनी जी से भगवान् श्रीकृष्ण विद्या ग्रहण करने के पश्चात् गुरु-दक्षिणा के रूप में गुरु-पुत्र लेने गये और पाञ्चजन्य (शंखासुर) का वध करके भगवान् ने शंख धारण किया किन्तु देवकी-वसुदेव को तो जन्म के पूर्व ही चतुर्भुज रूप का दर्शन करा दिया था, जो शंखादि आयुधों से सुशोभित था, तो वहाँ शंख कहाँ से आया ?"
महाराज जयसिंह के इस प्रश्न पर समस्त विद्वत्-समाज मौन था, तब अपने दस वर्षीय बालक की ओर देखते हुए पिता श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी ने उन्हें उत्तर देने के लिए कहा। बालक वंशीधर ने कहा –
"राजन् ! भगवान् के समस्त आयुध उनके ‘पार्षद’ हैं जो चिन्मय तथा नित्य हैं। पाञ्चजन्य शाप के कारण असुर हुआ एवं उसे मुक्त करने के लिए प्रभु ने उसका वध किया और वह मुक्त होकर अंश रूप से पुनः अपने नित्य पार्षद रूप में मिल गया, जैसे – सनकादिक मुनीश्वरों ने भगवान के पार्षद जय-विजय को शाप दिया था, जो तीन जन्मों के बाद पुनः मुक्त होकर अपने नित्य पार्षद रूप में जाकर मिल गए; इसी प्रकार पाञ्चजन्य भी शाप वश अपने अंश रूप से असुर बना और प्रभु के द्वारा मोक्ष प्राप्त करके पुनः नित्य पार्षद रूप को प्राप्त हो गया।"
दस वर्षीय बालक वंशीधर के मुख से शास्त्र-सम्मत व सन्तोषजनक इस उत्तर को पाकर महाराज के आश्चर्य की सीमा नहीं रही, हाथ जोड़ कर पिता श्री प्रद्युम्न गोस्वामी जी से महाराज ने कहा –
"यह बालक साधारण नहीं है, यह तो कोई अवतारी पुरुष प्रतीत होता है।"
इसके उपरान्त महाराज ने सम्मानपूर्वक श्री प्रद्युम्न गोस्वामी को अपार सम्पत्ति सहित जागीर भेंट की।
वैवाहिक जीवन :
बालक वंशीधर का विवाह 15 वर्ष की अवस्था में संपन्न हुआ। जब वे बीस वर्ष के हुए तो उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुयी जिसका नाम पुण्डरीकाक्ष रखा गया।
आध्यात्मिक जीवन :
राधाष्टमी पर बधाई गीत से भावावेश एवं वृन्दावन आगमन :
जब श्री वंशी अली 28 वर्ष के हुए तो पिता जी का धाम गमन हो गया। पिताजी के धाम गमन के एक वर्ष पश्चात राधा प्रेम में सहसा बाढ़ सी आ गई। जब राधा कुंड के एक पंडित राधाकृष्ण ने दिल्ली के मंदिर में राधा अष्टमी के उत्सव में बधाई गाई -
“रस बरसे री हेली कीरत महल में।”
उस समय श्री वंशी अली ऐसे प्रेम मगन हुए की प्रेमाश्रुओं की झड़ी लग गई। डेढ़ घंटे तक मूर्छित होकर भूमि पर पड़े रहे। चेतना आने पर हृदय में इतना प्रेम उल्लास भर गया कि उस वर्ष राधाष्टमी के उत्सव में तीन हजार रुपए खर्च कर बहुत धूमधाम से उत्सव मनाया। दूसरे वर्ष भी राधाष्टमी के उत्सव में दो हजार रूपए खर्च किए। माताजी अधिक धन खर्च करने से नाराज होकर बोली - भविष्य में इतना खर्च नहीं करना। वंशीधर को बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने कहा
"धन किस लिए है ? ठाकुर जी की सेवा के लिए ही न।"
वंशीधर जी रुष्ट हो कर अकेले वृंदावन आ गए। कुछ दिन बाद ही नादिरशाह का दिल्ली में लूट और कत्लेआम का दौर चला। उसी में मंदिर का सारा धन चले गया जिसे माता ने राधा अष्टमी के उत्सव में खर्च करने को मना किया था। वृंदावन में रास मंडल के पास ललित कुंज में वंशीधर जी तन्मयता पूर्वक भजन करने लगे।
श्री ललिता सखी से मन्त्र दीक्षा प्राप्त करना :
ललित कुञ्ज में श्रीराधारानी की आज्ञा से महासखी श्री ललिता जी ने श्री वंशीधर जी को मन्त्र-दीक्षा प्रदान किया जिसका उन्होंने स्वयं उल्लेख किया है –
गुरुः श्री ललिता ज्ञेया सा तु तस्याः परासखी।
तत्त्व स्वरूपा च भक्तास्या राधातोप्याधिका मम॥
"श्री वंशी अली जी की गुरु उनकी ज्ञेय श्रीराधारानी की परा सखी श्रीललिता जी हैं। शिष्य वंशी अली के लिये गुरु श्री ललिता जी तत्व स्वरूपा एवं रसिकों की प्रिय श्रीराधारानी से भी अधिक मान्य हैं।"
श्री वंशी अली जी की इस मान्यता का भाव श्री कबीर दास जी के इस दोहे से स्पष्ट है -
“गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय॥”
मन्त्र दीक्षा उपरांत श्री ललिता जी ने वंशीधर को बरसाने जाकर भजन करने की आज्ञा दी। साथ ही साथ यह आशीर्वाद भी दिया कि बरसाने में श्रीजी के दर्शन होंगे।
बरसाना में श्री राधारानी के दर्शन :
वंशीधर जी बरसाने आ गए। अब सभी लोग वंशी अली के नाम से पुकारने लगे। बरसाने में रंगीली गली में कूड़ा फेंकने के स्थान पर अपना आसन जमा कर भजन करने लगे।
एक मईया बोली - अरे बाबा ! “तोयै घूरे पै ही भजन करिबै की ठौर मिली का?”
वंशी अली जी बोले "मैया आप सखियों की चरण रज मुझे यहीं सुविधा पूर्वक प्राप्त होगी। जब आप कूड़ा फेंकोगी तो बरसाना के भक्तों की चरण रज उड़कर मेरे मस्तक पर लगेगी। इस लोभ से मैंने अपना आसन यहाँ लगाया है।"
वंशीअलि जी ने 12 वर्ष तक कूड़े पर पड़े रहकर भजन किया। श्रीजी ने कृपा करके दर्शन दिया।
बरसाना में सखी स्वरुप की प्राप्ति :
एक दिन वंशी अली जी ऊपर श्रीजी मंदिर में दर्शन करने गये। श्री चिंतामणि गोस्वामी जी श्रीजी की सेवा में थे। श्रीजी जगमोहन में विराज रही थीं। वंशी अली जी अपने धुन में जगमोहन में ऊपर चढ़ने लगे। गोस्वामी जी बार बार मना कर रहे हैं। लेकिन इन्होंने कुछ सुना ही नहीं। विवश होकर गोस्वामी जी ने अपनी खड़ाऊ खींचकर मारी। उस समय गोस्वामी जी आश्चर्यचकित रह गए यह देखकर कि एक स्वरूप से वंशी अली जी गोस्वामी जी से बात कर रहे हैं और दूसरे स्वरूप से श्रीजी की सेवा कर रहे हैं। गोस्वामी जी को बहुत पश्चाताप हुआ और वंशी अली जी से क्षमा भी मांगी। वशी अली जी बोले – आपकी कृपा से श्रीजी ने मुझे अपना परिकर बना लिया, आज से आप हमारे तीर्थ गुरु हुए। तभी से आज तक चिंतामणि जी के वंशजों को वंशी अली के वंशज अपना तीर्थ गुरु मानते आ रहे हैं।
परी रहौं वृषभानु के द्वारैं, जहाँ मेरी लाड़िली राधा।
खेलत आवै सुख उपजावै, प्राणन की ये साधा॥
कीरति कुल उजियारी प्यारी, हिय की चैन अगाधा।
ठौर नहीं ‘वंशीअलि’ हिय में, और लगै सब बाधा॥
नवीन संप्रदाय स्थापना (ललित सम्प्रदाय) :
श्री ललिता जी से मन्त्र दीक्षा प्राप्त कर श्री वंशी अली ने ‘ललित सम्प्रदाय’ का प्रवर्तन किया। सम्प्रदाय के आद्याचार्य के रूप में श्री ललिता सखी को सर्वाधिक महत्त्व देते हुए कहते हैं –
“इस निकुञ्ज रस में न विष्णु का प्रवेश है, न ही किसी अन्य देव का; यहाँ तो केवल ललिता जी की कृपा से ही प्रवेश प्राप्त किया जा सकता है। कहाँ तक कहें स्वयं श्री नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण भी ललिता जू की कृपा के बिना इस दुर्लभ रस को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। “
भगवान जगन्नाथ द्वारा श्री वंशी अली जी को श्री प्रिया जी की वंशी के रूप में सत्कार करवाना :
ललित संप्रदाय के मान्यता के अनुसार वंशी अली जी श्री राधा जी के वंशी के अवतार थे। ऐसा सुना गया है कि एक बार वंशी अली जी जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। उस समय जब वंशी अली जी जगन्नाथ जी के दर्शन करने मंदिर पधारें तो पंडो को स्वप्न देकर भगवान जगन्नाथ ने वंशी अली जी को श्री प्रिया जी की वंशी के रूप में सत्कार करवाया था।
ग्रन्थ रचना :
श्री वंशी अली जी की नित्य-विहार की उपासना अपने आप में विलक्षण है, जिसका ‘वृषभानुपुर शतकम’ नामक ग्रन्थ में विलक्षण दर्शन प्राप्त होता है, जो श्रीराधारानी की कृपा से ही अवगम्य है। ‘वृषभानुपुर शतकम’ के अतिरिक्त राधा स्तोत्र, ललिता मंगल एवं अष्टपदी आदि अनेक श्री वंशी अली जी की प्रमुख रचनाएँ हैं।
ललित कुंज में वास करते हुए बहुत से ग्रंथों की रचना की। संस्कृत में ‘राधा तत्व प्रकाश’ और राधा सिद्धांत नाम के दो ग्रंथों की रचना की। राधा पंचाध्याई मोक्षवाद, शक्ति स्वातंत्र परामर्श, राधा उपनिषद की संस्कृति टीका की। ब्रज भाषा में हृदय सर्वस्व श्री राधिका महारास, श्री लाडली जु की बधाई आदि अनेक ग्रंथों की रचना की।
शिष्य परंपरा :
वंशी अली जी के बहुत से शिष्य हुए। जिनमें किशोरी अली जी एवं अलबेली अली जी अधिक प्रसिद्ध है। किशोरी अली जी का पूर्व नाम जगन्नाथ भट्ट एवं मथुरा निवासी थे। पत्नी में बहुत आसक्त थे। अचानक पत्नी का धाम गमन हो गया जिनका नाम किशोरी था। अब तो अधिक दुख होने के कारण उन्माद की दशा में हा किशोरी ! हो किशोरी ! पुकारते पुकारते बरसाना आ गए। करुणा पुकार किशोरी जी के कान में पड़ी। श्रीजी बोली – इतने आतर स्वर में हमें कौन पुकार रहा है? ललिता जी बोली – वह आपको नहीं अपनी पत्नी को पुकार रहा है। परम भोली एवं करुणा में श्रीजी बोली - बरसाने में मैं ही एक किशोरी हूँ, उसे ले आओ। ललिता जी उनको ले आई। श्रीजी के इस प्रकार अनायास दर्शन करके परम कृतार्थ हुए। ललिता जी ने तब वंशी अली जी से दीक्षा लेकर भजन करने का आदेश दिया। दीक्षा के बाद नाम हुआ किशोरी अली। ये जयपुर महाराज के गुरु भी हुए हैं।
इनके अतिरिक्त, रतन अली व रामावत अली आदि शिष्य हुए हैं।
वंशीअली जी का वैराग्य :
वंशीअली जी वृंदावन का वास करते हुए परम वैराग्यमय एवं निरंतर लीलाओं के चिंतन में जीवन यापन करते। बहुत से धनवान सेवक के होते हुए भी अपने पास तुम्बी और अंगोछे के सिवा और कुछ भी नहीं रखते। लेकिन राधा अष्टमी का उत्सव जब आता तो बीस पचीस हजार रुपए खर्च करके बहुत धूमधाम से उत्सव मनाते। श्रीमद् भागवत की कथा कहते-कहते भाव विह्वल हो जाते। भागवत जी के श्लोकों का अनेक बार अनेक प्रकार से अलौकिक नविन अर्थ करते।
लीला संवरण :
वृन्दावन स्थित ललित कुंज में ही श्री किशोरी जी का नाम रटते हुए वंशी अली जी 1765 ई में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को नित्य निकुंज में अपनी दिव्य सखी स्वरुप में अवस्थित हो गए। यहीं ललित निकुंज में उनकी समाधि विराजमान है। वंशी अली जी के सिद्धांत पर राधा बल्लभ संप्रदाय एवं श्री हरिदासी संप्रदाय का विशेष प्रभाव है। इनके नित्य बिहार का स्वरूप वैसा ही है जैसा इन संप्रदायों का है। जैसे राधा बल्लभ संप्रदाय में राधा सेव्य हैं श्रीकृष्ण सेवक हैं।श्री राधा जी ही इष्ट हैं, ऐसा ही मत इनका भी है।श्री ललिता जी का स्थान हरिदास संप्रदाय के अनुरूप गुरु के स्थान पर है। कृष्ण तत्व को राधा जी की प्राप्ति के लिए ललिता जी की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है। इस संप्रदाय का पीठ स्थान जयपुर में लाडली जी का मंदिर है। ललित कुंज में सम्प्रति गादी पर महन्त आचार्य डा. श्री संजय गोस्वामी जी विराजमान हैं।

