जहाँ कृष्ण राधा तहाँ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (4)

जहाँ कृष्ण राधा तहाँ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (4)

जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कुष्ण।
न्यारे निमिष न होत दोउ, समुझि करौ यह प्रश्न॥ [1]
समुझि करौ यह प्रश्न, दोउ घन दामिनि जैसे।
सहज सुभाइ सुतंत्र, निरंतर बिहरत तैसे॥ [2]
भगवतरसिक अनन्य, बिना कोउ जात नहीं तहँ।
दंपति संपति - सहित, मदन रस रंग भरे जहँ॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (4)

जहाँ  श्रीकृष्ण है वही श्रीराधा भी हैं,और जहाँ श्रीराधा है वही श्रीकृष्ण भी हैं । ये दोनों एक पल के लिए भी अलग नहीं होते । इस बात को ठीक प्रकार से समझने के बाद ही यह प्रश्न कीजिये ( कि श्री बिहारीजी महाराज के साथ श्रीप्रिया प्रकट रूप में क्यों नहीं विराजमान है ।) [1]

ये दोनों तो घन दामिनी की तरह है । (घन से दामिनी एक क्षण  के लिए भी पृथक नहीं होती, अपितु उसी के अंग से सहज स्वाभाव संशिलष्ट रहकर विलास करती रहती है ।) श्री युगल भी इसी प्रकार सहज स्वाभाव एक दूसरे से संशिलष्ट रहकर स्वछंद नित्य रस विलास करते रहते हैं । [2] 

भगवत रसिक जी कहते है की अनन्य रसिक हुए बिना कोई उपासक वहाँ नहीं पहुँच सकता, जहाँ ये दोनों प्रिया प्रियतम अपनी समस्त सम्पति (रूप, वयस, चातुर्य लीला धाम आदि ) की सर्वोत्कृष्टता के साथ प्रेम रस रंग से भरे निरंतर बिहार करते रहते हैं । [3]